चालीस वर्ष के तमिल विद्रोही कमांडर करुणा ने लंबा सफ़र तय किया है.
किसी ज़माने में वह एलटीटीई के मुखिया वी प्रभाकरण के निजी सुरक्षा गार्ड हुआ करते थे और अब उन्हीं के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी है.
करुणा अब प्रभाकरण के सामने ही नेतृत्व की लड़ाई लेकर सामने आ गए हैं.
तमिल भाषा में करुणा का मतलब होता है दया. लेकिन करुणा असल में बहुत सख़्त कमांडर और अच्छे रणनीतिज्ञ हैं.
कर्नल करुणा का असली नाम विनायकमूर्ति मुरलीधरन है.
उन्हें तमिल विद्रोहियों का काडर में अच्छी संख्या में विद्रोहियों का समर्थन हासिल है और उनका ठिकाना श्रीलंका के पूर्वी क्षेत्र में बट्टीकलोआ इलाक़े में है.
करुणा विद्रोहियों के काडर में 1983 में शामिल हुए थे और कुछ ही सालों में वह पूर्वी प्रांत के उच्च कमांडर बन गए लेकिन उनकी महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ तो बाद में हुई जब उन्होंने सुरक्षा बलों से लड़ाई में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया.
रणनीतिज्ञ दिमाग़
श्रीलंका के सुरक्षा बलों ने जो जयसिकुरू अभियान चलाया था उसका सफलतापूर्वक मुक़ाबला करने वाली तमिल विद्रोहियों की रणनीति के पीछे करुणा का ही दिमाग़ बताया जाता है.
इसी दस्ते ने जाफ़ना प्रायद्वीप में सरकारी सेनाओं को कई बार कमज़ोर बनाया.
दरअसल तमिल विद्रोहियों के एक विशेष लड़ाकू दस्ते जयंतन फ़ोर्स का गठन भी करुणा की ही रणनीति का नतीजा है और इसी फ़ोर्स ने श्रीलंका की सेनाओं को कड़ी टक्कर दी है.
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एक कमांडर के रूप में करुणा की स्थिति उस समय और मज़बूत हो गई जब प्रभाकरण ने पिछले साल उन्हें पूर्वी बट्टीकलोआ क्षेत्र का विशेष कमांडर बना दिया.
प्रभाकरण ने बाद में करुणा को उस टीम में भी शामिल किया जिसने सरकारी दल के साथ बैंकाक, ओस्लो और टोक्यो में शांति वार्ता में हिस्सा लिया.
इन मौक़ों पर करुणा शुरू में तो पत्रकारों के साथ भी कुछ असहज नज़र आए लेकिन बाद में वे अपने विचार बहुत असरदार तरीक़े से रखने में कामयाब दिखे.
करुणा ख़ुद को संगठन में एक वरिष्ठ कमांडर बनाए जाने भर से ख़ुश नहीं थे बल्कि तमिल काडर में पूर्वी क्षेत्र को और ज़्यादा प्रतिनिधित्व और महत्व दिए जाने की माँग करते रहे हैं.
![]() प्रभाकरण मज़बूत नेता रहे हैं |
लेकिन करुणा ने देश में संसदीय चुनावों के महत्वपूर्ण समय में बग़ावत का झंडा उठाकर सबको चौंका दिया है.
श्रीलंका सरकार ने संभवतः प्रभाकरण की नाराज़गी को ध्यान में रखकर एक नए संघर्ष विराम समझौते की करुणा की माँग को फिलहाल तो नामंज़ूर कर दिया है.
अभी तक तमिल विद्रोहियों के संगठन एलटीटीई के मुखिया प्रभाकरण ने यह सुनिश्चित करने की पूरी कोशिश की है कि उनके संगठन का चरित्र सैनिक और गुरिल्ला तकनीक वाला ही बना रहे जिसमें राजनीतिक विरोध के लिए बहुत थोड़ी जगह रहे.
अब ऐसे हालात में प्रभाकरण अगर कोई क़दम उठाते हैं तो हो सकता है कि करुणा को अपने जीवन के सबसे मुश्किल समर का सामना करना पड़े.