बीबीसी का कारवाँ समस्तीपुर में था. हर दिन की तरह चौपाल जमी और भारी संख्या में लोग जुटे.
बातचीत का विषय था - हरियाली और ख़ुशहाली.
"नमस्कार, मैं लीसा हूँ, आप सब कैसे हैं."
जी नहीं, कार्यक्रम का संचालन, समस्तीपुर में स्टूडियो मैनेजर लीसा हैक ने नहीं किया था.
पर जब वहाँ उन्होंने अपनी नई-नई सीखी हिंदी में लोगों का स्वागत किया तो मौजूद तमाम श्रोताओं ने ज़ोरदार उत्साह से उनका अभिवादन किया.
दोपहर का एक बजा था, सूरज हर दिन से ज़्यादा गरम था और हर दिन से ज़्यादा श्रोताओं की बढ़ती संख्या थी.
चर्चा का विषय था - "इस जगह की उपजाऊ ज़मीन पर विकास की फ़सल."
मतलब ये कि हरियाली और ख़ुशहाली साथ-साथ.
लेकिन अधिकतर लोगों की राय यह थी कि ये सच हो तो सकता है लेकिन इस क्षेत्र और बिहार के किसानों के पास उपजाऊ ज़मीन के बावजूद ख़ुशहाली की फ़सल काटने का मौसम कभी नहीं आता.
नारे
सबकी अपनी-अपनी राय थी. कुछ काव्यात्मक अंदाज़ भी थे -
"जहाँ युवा हो लाचार, नारियों पर हो अत्याचार, वहाँ खुशहाली आएगी कैसे?
जहाँ लुटेरों की हो सरकार, फैल रहा हो भ्रष्टाचार, जहाँ पुलिस हो पॉकेटमार, वहाँ ख़ुशहाली आएगी कैसे?"
"हमारी भारत सरकार की कमज़ोरी है जिसकी वजह से किसान की ये हालत है. हमारे अटल जी भारत उदय का नारा देते हैं, लेकिन क्या सचमुच भारत का उदय है?"
"उत्पादन तो होता लेकिन उसका प्रचार नहीं हो रहा."
"बिहार के किसानों को शुद्ध प्रमाणित बीज नहीं मिल पाता."
"उपजाऊ ज़मीन, 80 प्रतिशत किसान, फिर भी नई पीढ़ी किसान नहीं बनना चाहती."
वहाँ मौजूद गाँव के मुखिया प्रमोद कुमार ने कहा, इसकी वजह ये है कि अब किसान की कोई इज़्ज़त नहीं है.
![]() चर्चा में महिलाएं भी बढ़चढ़कर भाग ले रही हैं |
गंभीर और नरम-गरम बहस के बीच कई बार हँसी की फुलझड़ियाँ भी छूटी.
अलग-अलग राय-विचारों और बहुत सी आवाज़ों के बीच डूबती उतरती ये सभा समाप्त हुई लेकिन चलते-चलते उन नारों का भी एक जायज़ा ले लिया जाए जो समस्तीपुर के श्रोताओं ने दिए -
"लक्स जैसी ख़ुश्बू हमाम में नहीं, बीबीसी जैसा चैनल संसार में नहीं."
"बीबीसी है नाम हमारा, जहन्नुम से भी ढूंढकर ख़बरें देना है काम हमारा."
"तटस्थता, निष्पक्षता, सत्यता है धर्म हमारा,
सत्ता की चापलूसी करना हरगिज़ नहीं है कर्म हमारा,
हटन आयोग का हंटर है गर पास तुम्हारे,
तो गिलिगन, डाइक, गेविन डेविस आएंगे किस दिन काम हमारे."