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इराक़ ले जाने के इंतज़ार में रखे हैं शव

भारत में कई शिया मुस्लिम परिवार अपने मृत सगे संबंधियों के शवों को सालों से सुरक्षित रखे हुए हैं.

ये शव इराक़ में शिया समुदाय के पवित्र ऩजफ़ शहर में उस जगह दफ़नाने के लिए रखे गए हैं जहाँ अब से 1350 साल पहले इमाम हुसैन और उनके 71 साथी शहीद हुए थे.

अब इराक़ में सद्दाम हुसैन की सत्ता के पतन के बाद शिया मुसलमानों में ये उम्मीद जागी है कि वे अपने पुरखों की कर्बला में दफ़न होने की इच्छा पूरी कर सकेंगे.

लखनऊ कई सदियों से भारत में शिया समुदाय का गढ़ रहा है.

यहाँ के ऐशबाग मुहल्ले के क़ब्रिस्तान मलका जहाँ में क़ब्र खोदने का काम करनेवाले मोहम्मद ख़लील का कहना है कि कर्बला ले जाने के लिए वहाँ एक लाश पिछले 12 वर्षों से सुरक्षित रखी हुई है.

ये मय्यत है शहर के मशहूर शिया मौलाना हमीदुल हसन की माँ इफ़्तिख़ार फ़ातिमा की.

मौलाना हसन ने बताया,"हमारी माँ ने वसीयत की थी. हमारी माँ के ख़ानदान में जितने भी लोग हैं उनके वालिद, वालिदा, इन सबकी वसीयतें होती रही हैं और सबको वसीयत के मुताबिक़ दफ़नाने कर्बला ले जाया गया".

उन्हें इस बात का मलाल है कि इराक़ के हालात ठीक नहीं होने की वजह से उन्हें अपनी माँ की मय्यत दफ़नाने में देर हो रही है.

इराक़ यात्रा

कई लोगों ने ये वसीयत की हुई है कि उनका शव इराक़ में दफ़नाया जाए

मौलाना याद करते हैं 1954 में वे स्वयं अपने मौसा का शव लेकर इराक़ गए थे.

भारतीय अधिकारी शव का डाक्टरी मुआयना कर और दूसरी औपचारिकताएँ पूरी कर अनुमति दे देते हैं.

किसी को ठीक-ठीक नहीं पता कि यहाँ ऐसे कितने शव सुरक्षित रखे हैं.

मोहम्मद खलील और कर्बला मलका जहाँ के दूसरे लोगों ने बताया कि शहर के कुछ दूसरे क़ब्रिस्तानों में भी ऐसे शव रखे हैं.

ऐसे शवों को सुरक्षित रखने के लिए उनपर रसायन लगाकर उन्हें स्टील के संदूक में रख क़ब्रिस्तान में सुरक्षित रख दिया जाता है.

ख़्वाहिश

एक बुज़ुर्ग मुस्तफ़ा अली ने कहा,"हम सबकी ख़्वाहिश है कि कर्बला में वहीं दफ़न हों जहाँ हज़रत इमाम हुसैन का रौज़ा है".

जो लोग वहाँ नहीं जा सकते उनकी तसल्ली के लिए यहाँ के स्थानीय कर्बला में भी बड़े इमाम हुसैन और उनके छोटे भाई का रौज़ा बनाया गया है.

शिया मुसलमानों का विश्वास है कि कर्बला में दफ़न होने से क़यामत के रोज़ उनसे ज़िंदगी का हिसाब-किताब नहीं माँगा जाएगा और उनको सीधे जन्नत में जगह दे दी जाएगी.

इस विश्वास को पूरा करने के लिए कर्बला के क़ब्रिस्तान में तहख़ाने बनाए गए हैं ताकि बाहर से आनेवाली मय्यतें भी यहाँ दफ़नाई जा सकें.

मुस्लिम मौलवी इस चलन की तुलना हिंदुओं की उस परंपरा से करते हैं जिसके तहत कई हिंदू काशी में गंगा तट पर देह त्यागने या फिर मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार की मनोकामना करते हैं.