शांति दूत महात्मा गाँधी ने किसी ज़माने में जिस साबरमती के किनारों पर अपना डेरा डाला था आज वही किनारों ने अहमदबाद को दो हिस्सों में बाँट दिया है.
उन किनारों ने अहमदाबाद के लोगों के बीच एक ऐसी लकीर खींच दी है जो है तो अदृश्य लेकिन उसका असर हर जगह देखा जा सकता है.
अहमदाबाद अब दो हिस्सों में बँट गया है - पूर्वी अहमदाबाद और पश्चिमी अहमदाबाद जिसके एक हिस्से में है ग़रीब आबादी और एक में है अमीर आबादी.
यह बँटवारा हिंदू और मुसलमान के आधार पर भी हो गया है.
वैसे यह कहानी गुजरात के सिर्फ़ अहमदाबाद शहर की ही नहीं है, यह लकीर बहुत से अन्य स्थानों में भी खिंच गई है.
समाज में धर्म के नाम पर दरार बढ़ती ही नज़र आ रही है और समाज 'हम' और 'वे' जैसे शब्दों में बँटता जा रहा है.
दो साल पहले हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद लोगों के रहने का तरीक़ बहुत बदल गया है और हर कोई अपने ही संप्रदाय में मकान बनाने या रहने को प्राथमिकता दे रहा है.
अपने-अपने इलाक़े
लोग अपने पुराने घर छोड़कर अपने संप्रदाय बहुल इलाक़े में रहने के लिए जा रहे हैं.
अहमदाबाद एक मुस्लिम बहुल इलाक़े में रहने वाले शीतल धोबी ने नानावती आयोग के सामने बयान दिया था, "इलाक़े के कुछ मुसलमान आकर कहते हैं कि अपना मकान एक लाख रूपए में हमें बेच दो और इलाक़ा छोड़कर चले जाओ."
"हम वैसे भी डरे हुए हैं, अगर मकान नहीं भी बेचते हैं तो भी अगर कुछ हुआ तो भी तो हमें जाना ही पड़ेगा."
ऐसी ही दूसरे समुदाय में भी है. फहमीदा बानो साँधी ने भी नानावती आयोग को बताया था, "वे हमें अपने मकान फिर से नहीं बनाने दे रहे हैं और न ही वे लोग अदालत के बुलाए जाने पर हाज़िर होते हैं.
"वे धूर्तता से कहते हैं कि तुम्हें मकान की क्या ज़रूरत है, तुम सिर्फ़ तीन बहने ही तो बची हो."
अक्सर इन शब्दों को सुना जाता है कि "हम तो सीमा पर रहते हैं, हम बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं हैं."
"बॉर्डर"
आख़िर यह सीमा क्या है. अहमदाबाद के जमालपुर इलाक़े के एक निवासी यूसुफ़ सैयद बताते हैं कि अपने समुदाय के इलाक़ों में जाने का यह सिलसिला तो 1969 से ही शुरू हो गया था जब शहर में पहली बार सांप्रदायिक दंगे बड़े पैमाने पर हुए थे.
"लेकिन यह सिलसिला 2002 के दंगों से और तेज़ हो गया है. यहाँ सीमा उसे कहा जाता है जहाँ हिंदू और मुसलमान बहुल इलाक़े आपस में बँटते हैं और दंगे भी ऐसे ही इलाक़ों से शुरू होते हैं."
अब तो नौबत यह भी आ गई है कि किराए पर मकान देने या मकान बेचने के लिए खुले तौर पर हिंदू और मुसलमान शब्द इस्तेमाल किए जाने लगे हैं.
एक अपार्टमेंट पर एक विज्ञापन लगा है जिसमें कहा गया है, "हिंदुओं के लिए किराए पर मकान उपलब्ध हैं."
विश्व हिंदू परिषद ने अनेक स्थानों पर बोर्ड लगाए हैं जिनमें कहा गया है, "हिंदू राष्ट्र के अमुक इलाक़े में आपका स्वागत है."
इतना ही नहीं, निजी कंपनियों और उद्योग धंधों में भर्ती में भी यह लकीर और गाढ़ी हो गई है.
रेशमा अचार बनाने की एक छोटी फ़ैक्टरी में काम किया करती थी, "दंगों के बाद हमें कह दिया गया कि अब इस फ़ैक्टरी में मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं है."
"उसके बाद मुझे अपना काम छोड़ना पड़ा और बच्चों के कपड़े सीकर अपनी रोज़ी-रोटी चलाती हूँ, लेकिन यहाँ भी मुश्किल ये है कि व्यापारी किसी मुसलमान से कपड़े सिलवाते हैं या नहीं."
![]() समाज बँटता जा रहा है |
इससे भी तकलीफ़ देने वाली बात ये है कि रेशमा को एक कपड़े की सिलाई के लिए सिर्फ़ एक रुपया मिलता है.
इसी तरह मुसलमान व्यवसायी भी अपने कारोबार में सिर्फ़ मुसलमानों को ही नौकरी देना पसंद करते हैं.
अगर बहुत ही मज़बूरी ना हो तो दोनों समुदाय के लोग अपने ही समुदाय के लोगों को नौकरी देते हैं या उन्हीं के साथ कारोबार करना पसंद करते हैं.
शहरों में ही नहीं, बल्कि बहुत से गाँवों में भी इसी तरह का माहौल बन गया है.
आणंद ज़िले के गोड़ासर गाँव का दौरा करने पर एक मुस्लिम व्यक्ति ने शिकायत की कि कोई हिंदू उसके ऑटोरिक्शा में नहीं बैठता.
"वे हिंदू ड्राइवरों को मेरे साथ कारोबार करने से रोकते हैं."