भारत में आम चुनाव में इस बार मतदान को पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक मशीनों के ज़रिए कराने की मुहिम चल रही है और इसके लिए वैज्ञानिक दिन-रात जुटे हुए हैं.
हालाँकि एक अरब से भी ज़्यादा आबादी वाले दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में इस काम को अंजाम देना एक बड़ी चुनौती से कम नहीं होगा जहाँ ज़्यादातर मतदाता ग़रीब और ग्रामीण हैं.
इस विशाल काम को पूरा करने के लिए क़रीब दस लाख इलेक्ट्रॉनिक मशीनों की ज़रूरत होगी और इतनी मशीनें बनाना और उनकी देखभाल करना भी ख़ुद बहुत चुनौती भरा काम है.
भारत में क़रीब सत्तर करोड़ मतदाता हैं और वे 543 संसदीय क्षेत्रों में मत डालेंगे और हर संसदीय क्षेत्र में सैकड़ों मतदान केंद्र बनाए जाते हैं.
भारतीय निर्वाचन आयोग इस चुनौती का सामना करने और इस बार मतदान इलेक्ट्रॉनिक मशीन के ज़रिए पूरी तरह चुस्त-दुरुस्त और विश्वास से भरा नज़र आता है.
मुख्य निर्वाचन आयुक्त टीएस कृष्णामूर्ति कहते हैं, "इस नज़र से यह एक ऐतिहासिक चुनाव होगा."
भारी काम
इलेक्ट्रॉनिक मशीने तैयार करने का यह भारी काम दो सरकारी कंपनियों को सौंपा गया है.
इनमें से एक भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बेल) के महाप्रबंधक एनएन सिन्हा बताते हैं कि कंपनी चार लाख 47 हज़ार मशीनें पहले ही तैयार कर चुकी है.
बंगलौर स्थित इस कंपनी के महाप्रबंधक सिन्हा कहता हैं, "हम बाक़ी साठ हज़ार भी जल्दी ही तैयार कर देंगे."
दूसरी कंपनी है इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया जो हैदराबाद में ये मशीनें बना रही है.
![]() काम भी आसान और परिणाम भी जल्दी |
यही नहीं, कुछ विदेशी कंपनियों ने भी ये मशीनें ख़रीदने में दिलचस्पी दिखाई है.
सिन्हा ने बीबीसी को बताया, "हम कुछ यूरोपीय देशों और अमरीका के लिए भी कुछ मॉडल बनाने पर काम कर रहे हैं."
"यह काफ़ी जटिल और मुश्किल काम है और इसमें अव्वल दर्जे की गुणवत्ता की ज़रूरत है."
दक्षिण एशिया और अफ्रीका के कुछ देशों को भी ये मशीनें निर्यात किए जाने का प्रस्ताव है.
बेल के बंगलौर कारख़ाने में ये मशीनें बनाने के लिए 200 से भी ज़्यादा इंजीनियर दिन रात जुटे हैं.
यही कारख़ाना भारतीय सेना के लिए इलेक्ट्रॉनिक हथियार भी बनाता है.
हालाँकि अभी मतदान की तारीख़ों की घोषणा नहीं हुई है लेकिन निर्वाचन आयोग ने ये मशीनें तैयार करने के लिए समय सीमा दे दी है.
सफल प्रयोग
पिछले साल नवंबर में पाँच विधान सभाओं के चुनाव में इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनों का प्रयोग किया गया था और इसके नतीजे देखकर लोग बहुत ख़ुश हुए थे.
सिन्हा बताते हैं, "लोग इतने उत्साहित थे कि उनकी प्रतिक्रिया देखते ही बनती थी, कुछ तो इस मशीन से खेलने के लिए उतावले थे."
सिन्हा इन आलोचनाओं को ख़ारिज करते हैं कि निरक्षर और ग्रामीण मतदाता इस मशीन को ठीक से इस्तेमाल नहीं कर सकते.
सिन्हा बताते हैं कि इस मशीन से ग़लतियाँ होने की संभाना बिल्कुल ना के बराबर है और इससे समय और प्रयास बहुत बचते हैं.
एक मशीन एक मिनट में पाँच मत दर्ज कर सकती है और एक दिन में 2700 मतदाता इसके ज़रिए अपना मत डाल सकते हैं.
"और परिणाम मिलने में भी देर नहीं लगती. पहले तो नतीजों के लिए कई दिन तक इंतज़ार करना पड़ सकता था."
एक 18 वर्षीय मतदाता अजीत का कहना था, "मैं मतदान के लिए उतावला हो रहा हूँ. सचमुच इस मशीन से मतदान करने में मज़ा आएगा."
लेकिन एक उम्रदराज़ मज़दूर मतदाता पापम्मा इस मशीन से ज़रा परेशान है, "मैं इस मशीन के बारे में कुछ भी नहीं जानता, मैं तो अभी तक अँगूठे के ज़रिए ही अपना वोट देता आया हूँ."
कर्नाटक के मुख्य चुनाव अधिकारी अभिजीत दासगुप्ता कहते हैं कि इन मशीनों से ग़लती होने की बिल्कुल भी संभावना नहीं है.
"यह बहुत तेज़ और बिल्कुल नपे-तुले नतीजे देने वाली है. इसमें भ्रम या ग़लती को कोई गुंजाइश ही नहीं है. बस निशान वाला बटन दबाना होता है."
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने भी इस मशीन को मंज़ूरी दे दी है.