गुजरात के ज़्यादातर हिस्सों में किसी मुस्लिम का मन टटोलकर देख पाएँ तो आप पाएँगे कि उसके भीतर डर, निराशा और कुंठा भरी हुई है.
गोधरा कांड और उसके बाद के दंगों के दो साल बाद उन्हें न्याय की उम्मीद तो है ही उनके आर्थिक और सामाजिक दबाव भी साथ में हैं.
मुसलमानों को अपना जीवन थोड़ा आसान बनाने के लिए कई सामाजिक, आर्थिक और मनौवैज्ञानिक समझौते करने पड़े हैं.
बाबूभाई बेदाशा इस मनोदशा का एक प्रतिनिधि उदाहरण हो सकते हैं.
अहमदाबाद के गोमतीपुरा इलाक़े में रहने वाले बाबूभाई ऑटोरिक्शा चलाते हैं और उनको अपनी दाड़ी इसलिए कटवानी पड़ गईं क्योंकि हिंदू सवारियाँ उसके ओटो पर बैठती नहीं थीं.
वैसे बेदाशा अकेला व्यक्ति नहीं है जो निम्न वर्ग से आता है और इस तरह की समस्याओं का सामना कर रहा है.
इशाक़ गाँधी एक पढ़ा लिखा मुस्लिम युवक है और उसकी कुंठा बताती है कि गुजरात में एक युवा क्या सोच रहे हैं.
इशाक़ का कहना है, ''मैं तो यह देश ही छोड़ देना चाहता था और एक एयरलाइन में काम की अर्जी दी थी लेकिन 11 सितंबर के बाद की दुनिया इतनी बदल गई है कि एक मुसलमान को किसी एयरलाइन में काम मिल ही नहीं सकता.''
उनका कहना है, ''यदि आप मुसलमान हैं तो आपके लिए गुजरात में उद्योग-धंधे में पूँजी लगाना भी सुरक्षित नहीं है. आज तो सब ठीक दिख रहा है लेकिन कल क्या होगा किसे पता है.''
इशाक़ और उनका परिवार भी गुजरात के दंगों का शिकार है.
उनका घर है जुहापुरा इलाक़े में जिसे स्थानीय लोग मिनी पाकिस्तान कहते हैं. वे कहते हैं, ''जैसे ही किसी को अपने घर का पता देता हूँ मुझे काम मिलने की संभावना उसी समय ख़त्म हो जाती है.''
हिंदू साझेदार
इस तरह के अनुभवों से हुआ यह है कि कोई भी मुस्लिम यदि कोई काम धंधा शुरु कर रहा है तो किसी हिंदू को अपना साझीदार बना रहा है.
उमरभाई अहमदाबाद के एक होटल के मालिक हैं और वे कहते हैं, ''इससे यह तो सुनिश्चित हो जाता है कि आपकी संपत्ति पर हमला नहीं होगा. इसलिए बड़ी संख्या में लोग हिंदुओं को अपना भागीदार बना रहे हैं.''
जिन ग्रामीण इलाक़ों में दंगे भड़के थे उनमें से कई इलाक़ों में अब भी लोग अब तक अपने घरों में नहीं लौट पाए हैं.
रेहाना कहती हैं, ''मैंने अपने समुदाय के तीन लोगों को मरते हुए देखा था और मैंने पुलिस के सामने बयान दिया था और तब से अब तक अपने गांव ओध नहीं लौट पाई जो आनंद में है.''
इस गांव के 60 प्रतिशत से भी अधिक लोग अभी भी गांव के बाहर रहते हैं.
कुछ इसी तरह की कहानी घोड़ासर की है जहाँ 14 मुसलमान मारे गए थे और इसके लिए 12 हिंदुओं को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई है. यहाँ भी बहुत से मुसलमान गांव वाले खेतों में रहते हैं.
इन सब के लिए न्याय अभी भी दूर की बात है.
गोधरा के बाद हुए दंगों के दस से भी अधिक मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने स्थगन आदेश दे रखा है और गुजरात सरकार से पूछा है कि क्यों न इन मामलों की सुनवाई गुजरात से बाहर की जाए.