गोरखपुर से बस्ती के रास्ते हमारे सामने जो ट्रक जा रहा था उस पर जहाँ ज़्यादातर समय 'हॉर्न प्लीज़' लिखा होता है- लिखा था 'ध्वनि कीजिए'.
मैंने सोचा 'हॉर्न प्लीज़' का इससे बढ़िया अनुवाद ज़रा मुश्किल ही होता 'ध्वनि कीजिए'!!
बनारस से लेकर आज़मगढ़ फिर वहाँ से गोरखपुर और फिर बस्ती. अभी तक पूरा क्षेत्र जितना दिखा- वो मन को गुदगुदाने वाला ही था.
एक बनारसी बाबू के शब्दों में-"अरे, इस इलाक़े में जैसे पान से धीरे-धीरे निकलता है रस, वैसे ही धीरे-धीरे चलती है ज़िंदगी."
कुछ ही देर में ये सारे शहर आपके कंधे पर हाथ रख कर बतियाने लगते हैं.
इस इलाक़े में अगर आपने अपनी गाड़ी से 'मूड़ी'(सिर) 'हुलकाकर' (निकालकर) कोई रास्ता पूछा तो जवाब थोड़ी देर बाद ही आता है.
इसलिए नहीं कि उन्हें मालूम नहीं, बल्कि इसलिए कि बोलने से पहले उन्हें पान की पीक थूकनी पड़ती है.
अब थोड़ा टाइम तो लगेगा न ! अधिकतर होठ पान से रंगे हुए.
आज़ादी
बस्ती की सड़कों पर साइकिल पर सवार 'फुर्र' होती लड़कियाँ ध्यान आकर्षित करती हैं.
आज़ादी का आभास दिलाती साइकिल चलाती लड़कियाँ मुझे हमेशा ही भली लगी हैं.
पूरा इलाक़ा 'लाइव वायर'जैसा है.
बीबीसी कारवाँ को निकले एक पखवाड़ा हो गया. हर जगह बीबीसी के लिए बहुत नारे मिले.
बीबीसी- बुद्धिवर्धक चूर्ण, बीबीसी- बहुत-बहुत कंजूस.......
![]() ऐसा पानी पीने को अभिशप्त हैं लोग |
लोगों को विश्वास है कि बीबीसी उनकी ज़िंदगी बदलती रहती है और बदल सकती है.
मऊ से आज़मगढ़ तक अपनी बात लेकर सफर किया राजेश यादव ने.
हमें दिखाने के लिए दो बोतल पानी के थे उनके पास.
उनके इलाक़े में बहती छोटी सरयू नदी का पानी और उनके इलाक़े के 160 फुट गहरे हैंड पंप से निकला पीने का पानी. जो इतना बदबूदार और गंदा था.
जनपद मऊ के घोसी इलाक़े के लोग इसी पानी को पीने के लिए मजबूर हैं.
राजेश यादव ने कहा, "आप अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात करती हैं. हम तो जीने के मौलिक अधिकार की गुहार लगाते हैं. आप पिएँगी ये पानी?"
लेकिन हम तो मुँह धोने के लिए भी मिनरल वाटर की बोतलों का इस्तेमाल कर रहे हैं.