बीबीसी हिंदी का कारवाँ जब बलिया के मुरली मनोहर डिग्री कॉलेज पहुँचा तो वहाँ मौजूद श्रोताओं ने हमारा तालियों की गड़गड़ाहट के साथ स्वागत किया.
बलिया और आसपास के गाँवों से लोग सुबह-सवेरे तैयार होकर बीबीसी से संवाद करने पहुँचे.
राजनीतिक रूप से सजग इस शहर के लोगों के लिए बातचीत का विषय था--अगर मैं बलिया का सांसद होता.
बीबीसी के एक श्रोता दिव्यज्योति चक्रवर्ती ने कहा, "आज नेता शब्द से लोगों का विश्वास उठ गया है, मैं कोशिश करूँगा कि लोग नेता को जनप्रतिनिधि समझें न कि धनप्रतिनिधि."
राजनीतिज्ञों की साख पर बार-बार सवाल उठाए गए, कारवाँ से संवाद करने आए ज्यादातर लोग छात्र और युवा थे.
अगर युवा बड़ी तादाद में मौजूद हों तो आंदोलन की बात उठना लाजिमी है, एक छात्र रत्नेश कुमार सिंह ने बड़े जोश के साथ कहा, "अगर आज के छात्र चाहें तो पूरी दुनिया की तस्वीर बदल सकती है, अगर छात्र सड़कों पर उतर आएँ तो आज की सभी समस्याएँ दूर हो सकती हैं."
सभा में मौजूद छात्रों के विचार ऐसा नहीं कि एक ही जैसे हों, एमएससी की छात्रा लीना सिंह ने बीबीसी हिंदी के इस कार्यक्रम में कहा, "आंदोलन करने से कुछ हासिल नहीं होता, हमारे देश की जनता साक्षर है,शिक्षित नहीं है जब तक लोग शिक्षित नहीं होंगे तब तक देश का विकास नहीं होगा."
थोड़ी ही देर में परिचर्चा का कार्यक्रम एक आमसभा में बदल गया, हर कोई अपनी बात कहने को बेताब दिखाई दिया.
एक छात्र जितेंद्र कुमार गुप्ता ने लिख भिजवाया कि वे खादी और खाकी वाले लोगों को सबसे पहले बदल डालेंगे और जींस-टी शर्ट वालों को प्राथमिकता देंगे.
जोश में आए कुछ छात्रों ने भोजपुरी में अपनी बात कही और कहा कि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनने की बात नहीं है, असल बात ये है कि किस तरह उपलब्ध साधनों का सही उपयोग किया जाए.
लोगों ने बलिया की पहचान कहे जाने वाले भृगुबाबा की जय-जयकार की और कहा कि पूरा देश इसी आवाज़ से पहचान जाएगा कि बीबीसी का कारवाँ बलिया आया था.