श्रीलंका में फिर से चुनाव होना कई पर्यवेक्षकों के लिए कोई हैरत वाली बात नहीं है.
देश में राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा और प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे के बीच संघर्ष की शुरूआत दो साल पहले ही हो गई थी जब विक्रमसिंघे की पार्टी ने चुनाव में जीत हासिल की.
दोनों के बीच कई मुद्दों पर असहमति और तकरार हुई.
विवाद ने सबसे ज़्यादा तूल पकड़ा तमिल विद्रोहियों के साथ शांति प्रक्रिया के मुद्दे पर.
अब सवाल ये पैदा होता है कि क्या इस वक़्त चुनाव करवाने से श्रीलंका की समस्या का अंत हो पाएगा?
चुनाव और शांति प्रक्रिया
रनिल विक्रमसिंघे ने दो साल पहले बहुत ही थोड़े से बहुमत औऱ छोटे दलों की सहायता से सरकार बनाई.
उन्हें जीत का जनादेश शांति के नाम पर मिला था.
इस कारण तुरंत ही तमिल विद्रोहियों के साथ शांतिवार्ता शुरू कर दी गई और इसमें नॉर्वे के प्रतिनिधियों ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई.
चुनाव के ठीक तीन महीने बाद ही स्थायी युद्धविराम की घोषणा कर दी गई.
इसके बाद प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे की लोकप्रियता देश के साथ अंतरराष्ट्रीय हलकों तक भी पहुँच गई.
पश्चिमी देशों ने शांति के लिए किए गए प्रयासों की सराहना की और देश के उत्तरी क्षेत्रों के पुनर्निर्माण के लिए काफ़ी सहायता राशि देने का वायदा किया.
राष्ट्रपति का रवैया
![]() राष्ट्रपति कुमारतुंगा अपने राजनीतिक विरोधियों की कामयाबी से खुश नहीं थीं |
चंद्रिका कुमारतुंगा ने कुछ समय पहले ही राष्ट्रपति चुनाव में जीत हासिल की थी और उन्हें अपने राजनीतिक विरोधियों की कामयाबी नहीं सुहा रही थी.
उनके सहयोगियों ने शांति प्रक्रिया की ये कहकर आलोचना शुरू कर दी कि सरकार तमिल विद्रोहियों को कुछ ज़्यादा ही रियायत दे रही है.
राष्ट्रपति का ये रवैया कई लोगों को अच्छा भी लगा और कुमारतुंगा ने कहा कि वे यह सब देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए कर रही हैं.
दक्षिणपंथी सिंहला पार्टियाँ और अति राष्ट्रवादी जनता विमुक्ति पेरामुना ने राष्ट्रपति का साथ देना शुरू किया.
राष्ट्रपति साथ-साथ इस बात की भी आलोचना कर रही थीं कि उन्हें शांति प्रक्रिया से दूर क्यों रखा गया.
तमिलों का रूख़
![]() तमिल विद्रोही आगामी चुनाव में अच्छा-ख़ासा राजनीतिक असर डाल सकते हैं |
तमिल विद्रोही इस सब के बीच अपने एजेंडे पर क़ायम थे.
वे सरकार के साथ बातचीत करते हुए ये दोष मढ़ रहे थे कि उत्तरी क्षेत्रों के विकास के लिए तमिलों को संसाधन नहीं सौंपे जा रहे.
तमिल विद्रोहियों पर भी ये आरोप लगा कि वे सेना के मुखबिरों और तमिल विद्रोहियों के विरोधियों की हत्या कर रहे हैं.
मगर वे इस बात से इनकार करते रहे कि उन्होंने संघर्षविराम का उल्लंघन किया है.
उन्होंने ये कहते हुए बातचीत भी स्थगित कर दी कि पहले सरकार संसाधनों के बंटवारे के बारे में कोई भरोसा दे.
चुनाव के आसार
पिछले वर्ष नवंबर में जब विक्रमसिंघे वाशिंगटन में थे तब राष्ट्रपति ने तीन प्रमुख मंत्रियों को बर्ख़ास्त कर दिया.
उन्होंने संविधान में दिए गए अधिकारों के आधार पर ये किया और प्रधानमंत्री इसके ख़िलाफ़ बहुत कुछ कर नहीं सकते थे.
संसद भी राष्ट्रपति पर महाभियोग नहीं चला सकती थी.
इस क़दम के बाद शांति प्रक्रिया विवादों में घिर गई.
राष्ट्रपति ने कहा कि प्रधानमंत्री अपना काम करते रहें मगर प्रधानमंत्री का कहना था कि रक्षा मंत्रालय पर नियंत्रण के बिना उनके लिए कुछ भी करना नामुमकिन है.
गठबंधन
चुनाव की घोषणा तब हुई जब राष्ट्रपति कुमारतुंगा की पार्टी ने जनता विमुक्ति पेरामुना के साथ गठबंधन किया.
राष्ट्रपति के गठबंधन में अब सभी राष्ट्रवादी सिंहला पार्टियाँ शामिल हो गई हैं.
इस कारण अब तमिल और मुस्लिम अल्पसंख्यक पार्टियाँ किनारे पड़ गई हैं.
मुस्लिम पार्टियाँ अब गठबंधन बनाना चाह रही हैं और मुख्य तमिल पार्टियाँ भी उत्तर और पूर्व में चुनाव लड़ने के लिए एक साझा मंच बनाने की कोशिश कर रही हैं.
आकलन
आगामी चुनाव में टक्कर काँटे की होगी और कई पर्यवेक्षक ऐसा मानते हैं कि 225 सदस्यों वाली संसद में वह तमिल गठबंधन काफ़ी महत्वपूर्ण रोल निभा सकता है जिसके सिर पर तमिल विद्रोहियों का हाथ हो.
इसके कारण तमिल विद्रोही ऐसी स्थिति में आ जाएँगे जो उनके लिए अभूतपूर्व होगी.
कई लोगों का मानना है कि इससे श्रीलंका की राजनीति में और दरारें आ सकती हैं.
और इस बार ये दरारें सांप्रदायिक रंग में रंगी होंगी.