पाकिस्तान में लाहौर की एक अदालत ने कहा है कि परमाणु प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के मामले में जिन वैज्ञानिकों से पूछताछ हो रही है उन्हें न्यायिक जाँच के लिए विदेशियों के हाथ में नहीं सौंपा जाना चाहिए.
उधर लाहौर में ही वकीलों ने इन परमाणु वैज्ञानिकों को हिरासत में लेने के विरोध में अदालतों का बहिष्कार किया है.
रावलपिंडी के उच्च न्यायालय ने ये आदेश उन वैज्ञानिकों के परिजनों और कुछ अधिकारियों की याचिकाओं पर दिया है.
वैज्ञानिकों के परिजनों को डर है कि वैज्ञानिकों को अमरीका या कुछ अन्य देशों को सौंपा जा सकता है.
उधर पाकिस्तान सरकार का कहना है कि उन वैज्ञानिकों के प्रत्यर्पण या इस जाँच में किसी विदेशी एजेंसी को शामिल करने की कोई योजना नहीं है.
सरकार के अनुसार ईरान और अन्य देशों को परमाणु प्रौद्योगिकी के संभावित हस्तांतरण की ये जाँच एक सप्ताह में पूरी कर ली जाएगी.
'विदेशियों को न सौंपें'
न्यायमूर्ति अनवार उल-हक़ ने पहले तो परिजनों और ख़ान रिसर्च लेबोरेटरीज़ के कुछ अधिकारियों की याचिका पर कोई कार्रवाई नहीं की.
मगर जब एक याचिकाकर्ता ने ये डर जताया कि वैज्ञानिकों को विदेशी एजेंसियों के हाथों में सौंपा जा सकता है तब उन्होंने ये आदेश सुनाया.
अदालत ने कहा कि इन वैज्ञानिकों को उसी अदालत के न्यायक्षेत्र में रखा जाना चाहिए.
अब तक इस बारे में 10-12 लोगों से पूछताछ हो चुकी है जिनमें देश के परमाणु कार्यक्रम के जनक माने जाने वाले अब्दुल क़दीर ख़ान भी हैं.
उधर सूचना मंत्री शेख़ रशीद अहमद ने कहा कि वैज्ञानिकों के प्रत्यर्पण की कोई योजना नहीं है और न ही जाँच में संघीय जाँच ब्यूरो, एफ़बीआई या किसी और विदेशी जाँच एजेंसी को शामिल किया जाना है.
वहीं लाहौर की अदालत के परिसर में वकीलों ने एक सभा की और कहा कि वैज्ञानिकों को अमरीका के इशारे पर परेशान किया जा रहा है.
इसके बाद सैकड़ों वकीलों ने एक जूलूस निकाला और राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के विरोध में नारे लगाए.