एक अध्ययन से पता चला है कि अफ़ग़ानिस्तान में अफ़ीम की खेती के ख़िलाफ़ तालेबान की लड़ाई आज के दौर में नशीली दवाओं के नियंत्रण की नीतियों से कहीं ज़्यादा असरदार थी.
1990 के दौर में दुनिया में हेरोइन की आपूर्ति में अफ़ग़ानिस्तान का बहुत बड़ा हिस्सा था.
लेकिन अब ब्रिटेन के एक विश्वविद्यालय ने इस अध्ययन में पाया है कि तालेबान की सख़्ती के परिणामस्वरूप वर्ष 2001 तक आते-आते दुनिया में हेरोइन के उत्पादन में दो तिहाई कमी आई है.
हालाँकि विश्वविद्यालय का यह भी कहना है कि ऐसे सख़्त तरीक़े दुनिया के बाक़ी हिस्सों में लागू नहीं किए जा सकते.
कहा जाता है कि अफ़ग़ानिस्तान से ही पश्चिमी देशों और पाकिस्तान और ईरान जैसे पड़ोसी देशों को अफ़ीम की तस्करी की जाती थी.
सख़्ती
तालेबान ने जुलाई 2000 से अफ़ीम की खेती पर पाबंदी लगा दी जो तालेबान के सत्ता से बेदख़ल किए जाने तक लागू रही.
ब्रिटेन के लॉबौरो विश्वविद्यालय के अपराध विज्ञान विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर ग्राहम फरेल ने यह शोध किया है जो अभी प्रकाशित होना है लेकिन बीबीसी को इसके कुछ नतीजे हासिल हो गए हैं.
प्रोफ़ेसर फरेल कहते हैं कि तालेबान का तरीक़ा इसलिए कामयाब हुआ क्योंकि अफ़ीम की खेती पर पाबंदी बिल्कुल निचले स्तर से और सख़्ती से लागू की गई.
प्रोफ़ेसर फरेल ने बीबीसी को बताया, "यह बिल्कुल साधारण तकनीक थी. अफ़ीम की खेती को उजाड़ देना और पाबंदी का उल्लंघन करके अफ़ीम की खेती करने वालों को सख़्त सज़ा देना."
उन्होंने बताया कि सबसे दिलचस्प बात ये थी कि इस नीति को बिल्कुल निचले स्तर से ही बहुत ही प्रभावी तरीक़े से लागू किया गया जिससे यह नीति बहुत कामयाब हुई.
फिर उत्पादन
फरेल बताते हैं कि तालेबान की नीतियों को स्थानीय क़बायली और मज़हबी नेता लागू करते थे और जो भी उल्लंघन करता हुआ पाया जाता था उसे कड़ी सज़ा मिलती थी.
प्रोफ़ेसर फरेल का कहना है कि कुछ किसानों ने फिर भी अफ़ीम की खेती करने की हिम्मत की थी तो उनके मुँह काले किए गए और कुछ को जेल की सज़ा काटनी पड़ी.
"कुछ ऐसे भी मामले हुए जिनमें उल्लंघन करने वालों को सड़कों पर घुमाया गया."
शोध के नतीजे बताते हैं कि तालेबान के शासन में अफ़ीम की पैदावार रुक गई और दुनिया भर में इसकी आपूर्ति में 65 प्रतिशत तक की गिरावट आई.
लेकिन तालेबान को सत्ता से हटाए जाने के बाद से अफ़ीम की खेती फिर से शुरू हो गई है.
प्रोफ़ेसर फरेल का कहना है कि तालेबान की अफ़ीम नीति की सफलता ने दुनिया भर में नशीले पदार्थों के नियंत्रण की नीति के वजूद पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
लेकिन उनका यह भी कहना है कि दुनिया के अन्य हिस्सों में तालेबान जैसे सख़्त तरीक़े नहीं अपनाए जा सकते हैं.