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उत्तर प्रदेश में नए समीकरणों के संकेत

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी बहुजन समाज की अध्यक्ष मायावती के घर जाकर उनको जन्मदिन की बधाई दे आई हैं.

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव की इस चेतावनी के बावजूद कि कांग्रेस को बसपा से दूर रहना चाहिए.

ध्यान रहे कि उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह सरकार को कांग्रेस का समर्थन हासिल है.

लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधनों की चर्चा ज़ोरों पर है और ऐसे समय में सोनिया गाँधी की मायावती से मुलाक़ात को उत्तरप्रदेश में गठबंधन की संभावनाओं से जोड़ कर देखा जा रहा है.

हालांकि दोनों नेताओं ने कहा है कि उन्होंने राजनीति पर कोई चर्चा नहीं की.

शुक्रवार को बसपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हो रही है और उत्तरप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने कहा है कि उनके एजेंडे में कांग्रेस से गठजोड़ का सवाल अहम रहेगा.

वैसे भाजपा के महासचिव मुख़्तार अब्बास नक़वी और प्रवक्ता प्रकाश झावड़ेकर भी मायावती को जन्मदिन की बधाई देने उनके घर गए थे.

नए समीकरण

उधर उत्तरप्रदेश में कांग्रेस अब भी समाजवादी पार्टी के सत्तारुढ़ गठबंधन को बाहर से समर्थन दे रही है.

इस गठबंधन में अजीत सिंह की पार्टी लोकदल और कल्याण सिंह की राष्ट्रीय क्रांति पार्टी शामिल हैं.

एक ओर कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी कह चुकी हैं कि वे गठबंधन के लिए अजीत सिंह से भी चर्चा करने वाली हैं दूसरी ओर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से कुछ दिन पहले कल्याण सिंह की मुलाक़ात के बाद माहौल बदला हुआ सा दिख रहा है.

उधर मुलायम सिंह ने बुधवार को लखनऊ में कहा था कि उत्तरप्रदेश सांप्रदायिकता का केंद्र है और वहाँ ऐसी ताक़तों से लड़ने के लिए कांग्रेस को बसपा से गठबंधन नहीं करना चाहिए.

उनका तर्क है कि बसपा तीन बार भाजपा से गठबंधन कर चुकी है इसलिए उससे संबंध बनाना ठीक नहीं होगा.

लेकिन राजनीतिक प्रेक्षकों को लगता है कि बसपा को दूर करने की कोशिशों में ख़ुद मुलायम सिंह यादव इन दिनों भाजपा के प्रति काफ़ी उदारता बरत रहे हैं.

हालाँकि मुलायम सिंह ने साफ़ कहा है कि वह भाजपा से कोई चुनावी गठबंधन नहीं करने जा रहे हैं क्योंकि उन्हें 'सांप्रदायिक ताक़तों से लड़ना है.'

एक तरफ़ उत्तरप्रदेश में राजनीतिक हाशिए पर खड़ी कांग्रेस के लिए अस्तित्व का सवाल है तो दूसरी ओर राजनीतिक दलों का उछाला हुआ नारा है कि राजनीति में कोई अछूत नहीं होता.

कुल मिलाकर उत्तरप्रदेश में इस बार लोकसभा चुनाव के पहले एक और राजनीतिक उठापटक की संभावना दिख रही है.