भारत सरकार और अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉंफ़्रेंस के बीच 22 जनवरी को दिल्ली में बातचीत हो सकती है.
हुर्रियत काँफ़्रेंस के अध्यक्ष मौलवी अब्बास अंसारी ने भारतीय उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के बातचीत के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है.
केंद्र सरकार ने ये प्रस्ताव मंगलवार को ही भेजा था.
अब्बास अंसारी ने बातचीत के प्रस्ताव पर खुशी प्रकट की है.
उन्होंने कहा,"हम इसका इंतज़ार कर रहे थे. हमारा लंबा इंतज़ार ख़त्म हुआ".
उन्होंने बताया कि गुरूवार को हुर्रियत की एक बैठक हो रही है जिसमें दिल्ली में होने वाली बातचीत के सिलसिले में चर्चा होगी.
साथ ही इसमें ये तय होगा कि हुर्रियत की तरफ़ से बातचीत में कौन लोग भागीदारी करेंगे.
प्रस्ताव
हुर्रियत अध्यक्ष ने आडवाणी के उस पत्र का ब्यौरा देने से इनकार कर दिया जिसमें बातचीत की पेशकश की गई थी.
मौलवी अंसारी ने बीबीसी को बताया,"हम बातचीत की राह में बाधा खड़ी नहीं करना चाहते. हमें आपस में मतभेदों को वैसे ही दूर करने दीजिए जैसा कि भारत और पाकिस्तान ने किया है".
उन्होंने कहा कि बातचीत के लिए न तो भारत सरकार और न ही हुर्रियत की तरफ़ से कोई शर्त रखी गई है.
मगर उन्होंने कहा कि हुर्रियत भारत सरकार के साथ मतभेद सुलझाने की अपनी योजना पर पहले कश्मीर की जनता को विश्वास में लेना चाहेगा.
अंसारी के नेतृत्व वाला गुट हुर्रियत के दो गुटों में से बातचीत के लिए आमंत्रित किया जाने वाला एकमात्र गुट है.
प्रतिक्रिया
सैयद अली शाह गिलानी के नेतृत्व वाले गुट ने अंसारी गुट और भारत सरकार की प्रस्तावित बातचीत को हुर्रियत के संविधान का उल्लंघन बताया है.
उन्होंने कहा कि हुर्रियत संविधान के अनुसार बातचीत त्रिपक्षीय होनी चाहिए यानी उसमें पाकिस्तान को भी शामिल किया जाना चाहिए.
उधर भारतीय कश्मीर के एक और अलगाववादी नेता शब्बीर शाह ने प्रस्तावित बातचीत का स्वागत किया है.
बातचीत के इस प्रस्ताव पर चरमपंथी संगठनों की तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.