बांग्लादेश सरकार ने अहमदिया समुदाय के सभी प्रकाशनों पर पाबंदी लगाने की घोषणा की है.
इससे एक दिन पहले ही कुछ कट्टरपंथियों ने कहा था कि वे इस समुदाय को ग़ैर-मुस्लिम क़रार दे रहे हैं.
धार्मिक मामलों के मंत्रालय की एक बैठक के बाद एक आधिकारिक बयान में कहा गया कि अहमदिया जमात यदि इस्लाम पर कोई भी किताब छापती है तो उसके प्रकाशन, वितरण और बिक्री को ग़ैर-क़ानूनी माना जाएगा.
इनमें क़ुरान शरीफ़ का बांग्ला या अन्य किसी भाषा में प्रकाशन भी शामिल है.
मंत्रालय की एक विज्ञप्ति में कहा गया कि यह पाबंदी इस लिए लगाई गई है क्योंकि ये प्रकाशन देश के बहुसंख्यक मुसलमानों की भावनाओं को आघात पहुँचा सकते हैं.
यह क़दम हिफ़ाज़ते-ख़त्मे नबुव्वत आंदोलन की पहल पर उठाया गया है जिसका मानना है कि मोहम्मद इस्लाम के आख़िरी पैग़बर थे और उनकी मांग है कि अहमदिया समुदाय को प्रतिबंधित कर दिया जाए.
माना जा रहा है कि प्रकाशनों पर पाबंदी लगाना इस दिशा में पहला क़दम है.
बांग्लादेश में लगभग एक लाख अहमदिया हैं जिन्हें क़ादियानी के नाम से भी जाना जाता है.
हालाँकि सरकारी अधिकारियों का कहना है कि इस बारे में बैठक में चर्चा तो हुई थी लेकिन कोई फ़ैसला नहीं लिया गया.
अहमदिया मुस्लिम जमात का कहना है कि इस फ़ैसले से पूरा समुदाय स्तब्ध है और सरकार धार्मिक आतंकवादियों के आगे झुक गई है.
जमात के प्रवक्ता अब्दुल अवाल का कहना है, इस क़दम से लोगों के अभिव्यक्ति के अधिकार का हनन होता है जो संविधान का एक अहम हिस्सा है.
लेकिन कट्टरपंथी मुस्लिम गुटों का कहना है, हम क़ादियानी प्रकाशनों पर पाबंदी के सरकार के फ़ैसले का स्वागत करते हैं और चाहते हैं कि इस समुदाय को जल्दी से जल्दी ग़ैर-मुस्लिम क़रार दिया जाए.
आंदोलन के एक प्रवक्ता महमूदुल हसन ममताज़ी का कहना है, जब तक हमारी मांग नहीं मानी जाएगी हम अपना आंदोलन जारी रखेंगे.
अब इस गुट ने अहमदिया समुदाय को ग़ैर-इस्लामी क़रार देने के लिए दो हफ़्ते की समयसीमा रकी है और कहा है कि ऐसा न होने पर उनका आंदोलन तेज़ हो जाएगा.