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'कश्मीरियों की अनदेखी हुई'

भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के बीच मुलाक़ात से दुनिया में कई जगह इन दोनों देशों के संबंध अच्छे होने की उम्मीदें जगी हैं.

जबकि पाकिस्तान जमाते इस्लामी और कुछ कश्मीरी संगठनों ने यह कहते हुए आलोचना की है कि कश्मीरी लोगों की अनदेखी की गई है.

कश्मीरी गुटों के संगठन यूनाइटेड जेहाद काउंसिल के प्रमुख सैयद सलाहुद्दीन ने कहा है, "सार्क ऐतिहासिक तथ्यों और ज़मीनी वास्तविकताओं की अनदेखी कर रहा है."

ग़ौरतलब है कि परवेज़ मुशर्रफ़ कह चुके हैं कि पाकिस्तान भारत प्रशासित कश्मीर में जनमतसंग्रह कराने की माँग छोड़ने को तैयार है.

पाकिस्तान 1948 से ही यह माँग करता रहा है कि भारत प्रशासित कश्मीर में संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के तहत इस पर जनमतसंग्रह कराया जाए कि वे भारत में रहना चाहते हैं या पाकिस्तान में शामिल होना चाहते हैं.

सैयद सलाहुद्दीन ने कहा है कि कश्मीर की संप्रभुता के सवाल का हल कश्मीरियों की इच्छा के अनुसार निकालना ही शांति का एकमात्र रास्ता हो सकता था.

"विडंबना ये है कि जो लोग शांति की बातें कर रहे हैं उन्हें कश्मीरियों की इच्छाओं का कोई ध्यान नहीं बल्कि वे कश्मीरियों की इच्छाओं को दबाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं."

जमाते इस्लामी

पाकिस्तान की एक प्रमुख धार्मिक पार्टी जमाते इस्लामी के मुखिया क़ाज़ी हुसैन अहमद ने कहा है कि भारत और पाकिस्तान के नेता पूरे कश्मीर मुद्दे की ही अनदेखी करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन पाकिस्तान के लोग इसकी इजाज़त नहीं देंगे.

"हम भारत के साथ पाकिस्तान की बातचीत के ख़िलाफ़ नहीं हैं लेकिन अगर भारत कश्मीर को अपना अटूट हिस्सा कहता रहेगा तो बातचीत के लिए जगह कहाँ बचती है."

क़ाज़ी हुसैन अहमद पाकिस्तान में छह इस्लामी दलों के संगठन मुत्तहिदा मजलिसे अमल (एमएमए) के अध्यक्ष भी हैं.

उन्होंने समाचार एजेंसी एएफ़पी से कहा, "हम यह मुद्दा संसद में उठाएंगे और प्रधानमंत्री को राष्ट्र को विश्वास में लेना होगा."

"वे व्यापार, खेल और लोगों के बीच सीधा संपर्क क़ायम करने की बातें कर रहे हैं लेकिन मुख्य मुद्दे का कोई ज़िक्र नही नहीं है. यह साफ़ तौर पर मुख्य विवाद की अनदेखी करना ही है."