अफ़ग़ानिस्तान में कबायली सरदारों की परंपरागत महासभा लोया जिरगा के दो सप्ताह तक चलने के बावजूद नए संविधान को लेकर मतभेद बने हुए हैं.
मंगलवार को कुछ प्रतिनिधियों ने इसके बहिष्कार की धमकी दे दी थी.
इसके बाद विभिन्न मुद्दों को सुलझाने को लेकर एक समिति गठित कर दी गई.
राजधानी काबुल में चल रहे लोया जिरगा में पाँच सौ से अधिक प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं और वे देश की भावी शासन व्यवस्था पर अब भी एकमत नहीं हो पाए हैं.
मतभेद का सबसे बड़ा मुद्दा राष्ट्रपति की जवाबदेही, आधिकारिक भाषा और मंत्रियों की दोहरी नागरिकता का सवाल है.
मतभदों को सुलझाने के लिए अब काबुल में बातचीत अलग से चल रही है.
बीबीसी संवाददाता का कहना है कि असली मतभेद सरकार समर्थक पश्तून नेताओं और मुजाहिदीन नेताओं के बीच हैं.
क्या है लोया जिरगा?
यह अफ़ग़ानिस्तान की एक अनूठी संस्था है जिसमें तमाम कबायली समूहों के नेता एक साथ बैठते हैं.
इसकी बैठक में देश के मामलों पर विचार-विमर्श कर फ़ैसले किए जाते हैं.
लोया जिरगा पश्तो भाषा का शब्द है और इनका मतलब है महापरिषद.
सैकड़ों साल पुरानी यह संस्था इस्लामी शूरा या सलाहकार परिषद जैसे सिद्धांत पर ही काम करती है.
अब तक कबीलों के आपसी झगड़े सुलझाने, सामाजिक सुधारों पर विचार करने और नए संविधान को मंज़ूरी देने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता रहा है.