पाकिस्तान में अब वयस्क मुस्लिम महिलाएँ अपनी मर्ज़ी से किसी से भी शादी कर सकेंगी.
देश के सुप्रीम कोर्ट ने यह फ़ैसला सुनाते हुए हाई कोर्ट के पहले के आदेश को बदल दिया जिसमें कहा गया था कि माता-पिता या अभिभावक की अनुमति के बिना ऐसी शादियाँ अवैध मानी जाएगी.
पाकिस्तान में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ छह सालों से संघर्ष छेड़ रखी थी.
मानवाधिकार संगठनों का कहना था कि हाई कोर्ट का फ़ैसला इस्लाम के ख़िलाफ़ और महिलाओं के प्रति भेदभाव पूर्ण है.
महिलाओं के अपनी पसंद के युवक से शादी करने के अधिकार पर विवाद 1997 में शुरू हुआ जब लाहौर हाई कोर्ट ने इस मामले को दोबारा खोला. हालाँकि यह मामला पहले ही देश की इस्लामी शरिया अदालत ने निपटा लिया था.
1991 में शरिया अदालत ने घोषणा की थी कि एक मुस्लिम वयस्क महिला का अपने अभिभावक की सहमति या बिना सहमति के अपनी पसंद के युवक से शादी करना उसका अधिकार है.
विवाद
1997 में लाहौर हाई कोर्ट ने दो अलग-अलग फ़ैसलों में आदेश दिया कि जब तक महिला को अपने पिता या अभिभावक से अनुमति नहीं मिल जाती, इस तरह की गई शादी अवैध मानी जाएगी.
इस फ़ैसले से प्रभावित कई शादी-शुदा जोड़ों ने इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की.
पाकिस्तान की चर्चित मानवाधिकार कार्यकर्ता और वकील असमा जहाँगीर ने भी इसके ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद की और तर्क दिया कि लाहौर हाई कोर्ट का फ़ैसले से पुलिस को मनमाना अधिकार मिल जाएगा.
उनका मानना था कि पुलिस ग़लत आरोपों पर भी शादी-शुदा जोड़ों को गिरफ़्तार कर लेगी.
असमा ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हाई कोर्ट के फ़ैसले के बाद ढाई सौ से ज़्यादा महिलाएँ जेल में बंद हैं क्योंकि उन्होंने अपने माता-पिता की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ शादी की थी.
अटॉर्नी जनरल ने भी लाहौर हाई कोर्ट के फ़ैसले का विरोध किया और कहा कि उसे ऐसे मामलों में शरिया अदालत के फ़ैसले पर सवाल खड़ा करने का अधिकार नहीं.