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काबुल में लोया जिरगा की अहम बैठक

अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में रविवार को डेढ़ साल के बाद लोया जिरगा या महापरिषद की बैठक हो रही है.

इसमें भाग लेने आए देश भर के प्रतिनिधि, अफ़ग़ानिस्तान के नए संविधान का अनुमोदन करेंगे.

लेकिन उससे पहले 160 अनुच्छेदों वाले मसौदे पर बहस होगी, जो लम्बी चल सकती है.

ये अफ़ग़ानिस्तान के आधुनिक इतिहास में एक निर्णायक क्षण है.

लोया जिरगा के सदस्य नए संविधान का अनुमोदन करेंगे.

अफ़ग़ानिस्तान तेइस साल के गृहयुद्ध से हुए विनाश से उबरने की कोशिश कर रहा है और ये संविधान उसकी आधारशिला होगी.

बैठक में बहस का प्रमुख विषय होगा कि देश में किस तरह की राजनीतिक व्यवस्था क़ायम की जाए.

संविधान के मसौदे में राष्ट्रपति प्रणाली की सिफ़ारिश की गई है लेकिन कुछ सदस्य इसे ठीक नहीं मानते.

अफ़ग़ानिसतान के भूतपूर्व शाह की पार्टी नेशनल यूनिटी मूवमेंट के नूरज़ई अब्दुल हकीम इस प्रणाली के ख़िलाफ़ हैं.

वे कहते हैं, ''अफ़ग़ानिस्तान पिछड़े देशों में गिना जाता है. हमारे यहां कोई मज़बूत न्याय व्यवस्था नहीं है. जनता की भी कोई आवाज़ नहीं. ऐसे में राष्ट्रपति को ज़्यादा अधिकार देने से, उसके तानाशाह बनने का ख़तरा बढ़ता है. लोकतंत्र के लिए बेहतर होगी एक मज़बूत संसद.''

भले ही कुछ स्वर संसदीय प्रणाली के पक्ष में हों लेकिन राष्ट्रपति हामिद करज़ई मानते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान जैसे बंटे हुए देश में संसदीय प्रणाली नहीं चल सकेगी.

करज़ई कहते हैं, ''मेरे विचार में संसदीय प्रणाली से देश के क़बाइली नेताओं को वैधता मिल जाएगी और संसद में ऐसे लोग आकर बैठेंगे जो छोटे छोटे दलगत हितों से ऊपर नहीं उठ पाएंगे. मज़बूत राजनीतिक दलों, मज़बूत संस्थाओं और मज़बूत सेना के अभाव में ये मुल्क बिखर जाएगा.''

सुरक्षा की चिंता

लोया जिरगा की ये बैठक ऐसे समय में हो रही है जब अफ़गानिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चिंता जताई जा रही है.

ऐसा माना जा रहा है कि तालेबान के लड़ाके फिर संगठित हो रहे हैं.

हालांकि राष्ट्रपति करज़ई इन ख़बरों का खंडन कर चुके हैं.

तालेबान ने लोया जिरगा के सदस्यों को काफ़िर कहा है और बैठक में बाधा पैदा करने की धमकी भी दी है.

सरकार ने सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए हैं.