मेरे भैया सत्येंद्र दुबे हद से ज़्यादा प्यारे इंसान थे. उन्हें हमेशा दूसरों की फ़िक्र रहती थी.
यदि भैया को लगता कि उनके जान देने किसी का एक भी बूंद ख़ून बचाया जा सकता है तो शायद वह ऐसा कर भी जाते.
वह भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अकेली लड़ाई लड़ रहे थे.
मुझे कई बार उनके प्रोजेक्ट वाले इलाक़े का दौरा करने का मौक़ा मिला.
मैंने देखा कि कैसे भैया धूल-धक्कड़ की परवाह किए बिना दूर-दराज के इलाक़ों में भी जाते थे.
वह सातों दिन काम पर जाते, जबकि आम तौर पर बाकी मैनेजर 10-15 दिन में एक बार प्रोजेक्ट स्थल पर जाने को ही बड़ा काम मानते हैं.
भैया ने प्रोजेक्ट में एक-एक मशीन और उपकरण का हिसाब रखा था.
उनके चारों ओर भ्रष्टाचार हद से ज़्यादा था.
भैया ने कई भ्रष्ट लोगों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की थी. उनके कहने पर एक कंसल्टेंट इंजीनियर का तबादला कर दिया गया था.
इन सब कारणों से उन पर दबाव तो था, लेकिन हमें नहीं लगता कि उन्हें किसी से जान पर ख़तरे का एहसास था.
उन्होंने भ्रष्टाचार की शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय तक से की थी, लेकिन हमें नहीं लगता कि उनका नाम लीक होना उनकी हत्या का कारण बना.
वैसे ही उनसे अनेक लोग नाराज़ थे.
दुनिया भर से लोग हमारे परिवार के प्रति सहानुभूति व्यक्त कर रहे हैं.
प्रधानमंत्री वाजपेयी ने भी अफ़सोस व्यक्त किया लेकिन उनकी बात हम तक मीडिया के ज़रिए ही मिल पाई.
उनके जाने से निश्चय ही हमारे परिवार की आर्थिक स्थिति दुष्प्रभावित हुई है लेकिन सरकार से मदद का कोई आश्वासन नहीं मिला है.
हम सिर्फ़ यही चाहते हैं कि दोषी पकड़े जाएँ और भैया की मुहिम को आगे बढ़ाया जाए.
उनकी मौत से भारतीयों में जो चेतना जगी है वह नष्ट नहीं हो.
(बीबीसी रेडियो से बातचीत पर आधारित)