उमा भारती, वसुंधरा राजे सिंधिया, शीला दीक्षित, राबड़ी देवी और जयललिता में क्या समानता है?
वह यह कि ये पाँचो महिलाएँ मुख्यमंत्री हैं.
चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के मैदान में मोर्चा संभालने वाली महिलाएँ अपने-अपने राज्य के मुद्दों को सुलझाने की योजनाएँ बना रहीं हैं.
मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री उमा भारती का कहना है,"विकास के लिए समय चाहिए. सड़क के लिए एक साल और रोज़गार के लिए दो साल".
दूसरी तरफ़ राजस्थान में मुख्यमंत्री पद पर आई वसुंधरा राजे सिंधिया का कहना है, "महिलाओं ने घूंघट से बाहर निकल वोट दिया है. मैं उनका धन्यवाद करती हूँ."
मध्य प्रदेश और राजस्थान ऐसे राज्य हैं जहाँ अन्य राज्यों की तुलना में महिलाएँ अधिक पिछड़ी और कम पढ़ी लिखीं मानी जातीं हैं.
ऐसे में महिलाओं के नेतृत्व में राजनीतिक दलों को मिली जीत एक सुखद संयोग है.
अभी तो मीलों हमको चलना है
सामाजिक कार्यकर्ता वृंदा कारत इस बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं मानतीं.
लेकिन वे इतना ज़रूर कहतीं हैं,"श्रेय तो मिलना ही चाहिए. मैं इसे नहीं नकारती लेकिन एक बात साफ़ है कि इन महिलाओं ने अपनी राजनीतिक पार्टियों द्वारा तय लक्षमण रेखा नहीं लाँघी है. इसे फ़िलहाल पुरुषों के साथ समानता नहीं तो शुरुआत तो मान ही सकते हैं."
जानकार मानते हैं कि पिछले कुछ वर्षों मे महिलाओं की राजनीतिक क्षेत्र में भूमिका बढ़ी है लेकिन उन्हें अभी भी उचित स्थान नहीं मिल पाया है.
पार्टियाँ अभी भी बहुत कम संख्या में महिलाओं को टिकट दे रही हैं.
अभी भी संसद में महिलाओं के पास सिर्फ़ 17% सीटें हैं.
कैबिनेट स्तर के मंत्रियों में सिर्फ़ 10 प्रतिशत महिलाएँ हैं.
न्यायालयों और प्रशासनिक क्षेत्र में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी तीन से चार प्रतिशत ही है.
ऐसे में इन महिला नेताओं को एक महिला होने के नाते बहुत कुछ करना है.
लेकिन क्या इन महिलाओं की जीत भारतीय राजनीति में कोई उथल-पुथल ला पाएगी.
भारतीय राजनीति पर पैनी नज़र रखने वाले पुष्पेश पंत का मानना है," ऐसा कहना गलत होगा कि महिलाओं के मुख्यमंत्री बनने का भारतीय राजनीति पर कोई गहरा प्रभाव पड़ेगा."
वे कहते हैं, "भारतीय राजनीति की पटरी से उतरी गाड़ी पर इसका कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा. वैसे भी वसुंधरा राजे या उमा भारती आम भारतीय महिला का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं हैं. एक महारानी है तो दूसरी सन्यासिन."
पुष्पेश पंत का मानना है कि जब तक ज़मीनी स्तर पर महिलाओं की स्थिति में बदलाव नहीं आता है तब तक ऐसा सोचना बेवकूफ़ी होगी.
अब देखना ये है कि आने वाले पाँच सालों में महिलाओं की स्थिति बेहतर करने के लिए ये महिला मुख्यमंत्रियाँ क्या क्या करतीं हैं.