अयोध्या की पहचान एक ऐतिहासिक धार्मिक नगरी के रूप में रही है.
अयोध्या की ओर हमेशा से हर धर्म के मानने वाले आकर्षित रहे हैं.
यही कारण है कि अयोध्या में जहाँ बड़ी संख्या में हिंदू मंदिर हैं वहीँ मुसलमानों की ईबादतगाहों की संख्या भी काफ़ी बड़ी है.
इसके साथ ही अयोध्या बौद्ध और जौन धर्म के मानने वालों के लिए भी एक विशेष तीर्थ स्थान है.
इसके अलावा सिखों के पवित्र स्थान और गुरुद्वारे भी अयोध्या में स्थित हैं.
दरअसल, अयोध्या हमेशा से एक ऐसी नगरी रही है जिसके लिए हर दौर के धर्मगुरुओं और शासकों ने कुछ न कुछ किया है.
इस मामले में मुग़ल बादशाहों से लेकर अवध के नवाबों तक ने भी विभिन्न तरिकों से अपना योगदान दिया है.
अयोध्या में मौजूद कई मंदिरों का निर्माण मुग़ल बादशाहों की तरफ़ से दी गई ज़मीन पर हुआ है और इस बात के काग़जी प्रमाण भी मौजूद हैं.
अयोध्या-फ़ैज़ाबाद क वरिष्ठ पत्रकार शीतला सिंह कहते हैं, "वो लोग एहसान फ़रामोश हैं जो मुसलमान हुक्मरानों को सिर्फ़ मूतसिब और लुटेरा कहते हैं."
शीतला सिंह कहते हैं कि मुग़ल बादशाहों ने अयोध्या के लिए जो ज़मीनें दी हैं उनके लिखित सबूत दस्तावेज़ी शक्ल में बादशाही फ़रमानों के तौर पर आरज भी ज़्यादातर मंदिरों के महंतों के पास मौजूद हैं.
इतिहास के पन्ने
आज अयोध्या में मंदिरों की अधिक संख्या के कारण ये कहा जा सकता है कि अयोध्या हिंदुओं के लिए सबसे पवित्र नगरी है लेकिन इतिहास के पन्ने कुछ और भी बयाँ करते हैं.
अयोध्या के धार्मिक स्थलों की जानकारी 1865 में प्रकाशित एक पुस्तक ' ए हिस्टोरिकल स्केच ऑफ़ टेंपल्स ऑफ़ अयोध्या' में भी मिलती है.
इस किताब के लेखक पी कार्नेगी पहले वहाँ के ज़िला मजिस्ट्रेट हुआ करते थे.
पाँचवीं और सातवीं सदी में चीनी यात्री और इतिहासकार फ़ा ह्यान और ह्यूएन साँग ने अयोध्या की यात्रा की थी.
उस समय अयोध्या बौद्ध मत की एक पवित्र नगरी मानी जाती थी.
इसके अलावा अयोध्या में जैनियों और सिक्खों के धार्मिक स्थल भी हैं.