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भोपाल गैस पीड़ितों के लिए प्रदर्शन

भारत में हज़ारों छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता मंगलवार रात को रोष प्रदर्शन कर रहे हैं.

इन प्रदर्शनों का मकसद क़रीब दो दशक पहले हुई भोपाल गैस दुर्घटना के शिकार हुए लोगों को न्याय दिलाना है.

दो दिसंबर 1984 को हुई इस दुर्घटना में भोपाल में एक अमरीकी कंपनी युनियन कारवाईड के एक कारखाने से मिथाइल आइसोसायानेट के रिसाव से लगभग 2000 लोगों की मौत हो गई थी.

भोपाल गैस दुर्घटना की चपेट में आए लोगों में से जिनकी जान बच गई उन्हें अब तक स्वास्थ्य और मुआवज़े के लिहाज़ से न्याय नहीं मिल पाया है.

इस मामले से जुड़े संगठनों का कहना है, "भारत और अमरीका की अदालतों में इस मामले में न्याय मिलने में हुई देरी को देखा जाए तो यह एक बेहद शर्मनाक मामला है."

इस साल की शुरुआत में एक अमरीकी अदालत ने इस मामले से संबंधित मुआवज़े की एक याचिका को ख़ारिज़ कर दिया.

अदालत का कहना था कि युनियन कार्बाइड नामक कंपनी ने दुर्घटनास्थल की साफ़ सफ़ाई करवा कर अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी कर लीं.

युनियन कारबाइड ने भी 1989 में अदालत के बाहर ही लगभग 47 करोड़ डॉलर का हर्ज़ाना भरकर अदालत के बाहर ही इस मामले से हाथ धो लिया था.

वादे और आशा

भोपाल गैस दुर्घटना से प्रभावित लोगों को अब युनियन कारबाइड कंपनी या सरकार की आर्थिक मदद की जगह स्वयमसेवी संगठनों से ज़्यादा आशाएँ हैं.

उस कारखाने के आसपास के इलाकों में रहने वाले ग़रीब लोगों को आज भी काफ़ी दिक्कतें उठानी पड़ रही हैं.

उनके पास दवाईयों तक के पैसे नहीं हैं.

वहाँ रहने वाली एक महिला रइसा बी अपने पति की दवाईयों के लिए सिलाई का काम करती हैं जो कि स्वाभिमान नामक एक स्वयमसेवी संगठन से मिला है.

उन्होंने बीबीसी को बताया," बीस साल हो गए अब तक हम से किए गए वादे पूरे नहीं किए गए हैं. हमें तो बस भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है."

इस दुर्घटना में क़रीब एक लाख लोग घायल हो गए थे. इस तरह वहाँ सैकड़ों लोग हैं जो काफ़ी परेशानी का सामना कर रहे हैं.

इस दुर्घटना के बाद भी बीस हज़ार लोगों की मौत हो चुकी है.