भारत के चार राज्यों - दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव प्रचार शनिवार शाम समाप्त हो गया.
इसके बाद अब चुनावी सभाएँ और रैलियाँ नहीं हो सकतीं लेकिन उम्मीदवार घर-घर जाकर जनसंपर्क कर सकते हैं.
इन चारों राज्यों में पहली दिसंबर को मतदान होना है और मतगणना चार दिसंबर को होगी.
इन हिंदी भाषी राज्यों के 590 विधानसभा चुनावों के बारे में कहा जा रहा है कि इन चुनावों के परिणाम अगले साल होने वाले आमचुनावों को लेकर मतदाता के रुझान की भविष्यवाणी करेंगे.
यह भी माना जा रहा है कि इन चुनावों के परिणामों से राजनीतिक दलों को अगले साल होने वाले चुनावों के लिए रणनीति तय करने का मौक़ा भी मिलेगा.
इन सभी राज्यों में इस समय कांग्रेस की सरकार है और अगली सरकार के लिए टक्कर कांग्रेस और भाजपा के बीच ही है.
दिल्ली
राजधानी दिल्ली सत्तारुढ़ कांग्रेस ने पिछली बार भाजपा को बुरी तरह हराने के बाद अपनी सरकार बनाई थी.
तब कहा गया था कि प्याज़ के दाम बढ़ जाने की वजह से भाजपा की हार हो गई.
चाहे जो हुआ हो इस बार चुनाव में कोई ऐसा मुद्दा नहीं है जो पूरे राज्य में एक समान असर डाल रहा हो.
लिहाजा हर विधानसभा की समस्याएँ चुनाव का स्थानीय मुद्दा है.
वैसे पूरे देश की तरह बिजली पानी की समस्या यहाँ भी बनी हुई है.
इस बार भाजपा ने पुराने मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना को फिर उम्मीदवार बना रखा है.
कांग्रेस की ओर से मुख्यममंत्री शीला दीक्षित फिर उम्मीदवार हैं.
राजस्थान
राजस्थान में चुनावी माहौल गुजरात के चुनाव के बाद से ही बनने लगा था.
बीबीसी संवाददाता नारायण बारेठ के अनुसार तब भाजपा को लगता था कि वे गुजरात की तर्ज़ पर ही राजस्थान का चुनाव भी जीत सकेंगे इसलिए वहाँ विश्व हिंदू परिषद ने वहाँ त्रिशूल बँटवाना शुरु कर दिया था.
लेकिन इसके बाद अकाल आया और फिर अच्छी बारिश.
इससे भाजपा का हिंदुत्व का मुद्दा धुल गया और बात बेरोज़गारी और विकास पर आ ठहरी है.
दूसरी ओर कांग्रेस ने पिछले पाँच सालों के अपने काम के आधार पर ही वोट माँग रही है.
हालांकि भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस ने जातिवाद का मुद्दा भी ख़ूब उछाला है.
200 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस ने भाजपा को जोरदार झटका दिया था और दो तिहाई सीटें जीत ली थीं.
इसके बाद अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने थे. वे एक बार फिर मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं.
उनके मुक़ाबले में भाजपा ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दिलवाकर वसुंधरा राजे सिंधिया को मैदान में उतारा है.
भाजपा ने इस बार राजस्थान में अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है.
बीबीसी संवाददाता का कहना है कि एसएमएस से लेकर हवाई जहाज़ से पर्चे बँटवाने तक भाजपा ने सभी हाईटेक तरीक़े इस्तेमाल किए हैं और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की सभाओं सहित कुल दो सौ तीस से अधिक चुनावी सभाएँ की हैं.
दूसरी ओर कांग्रेस ने पारंपरिक तरीक़ो से ही चुनाव प्रचार किया है और बड़ी सभाओं में सोनिया गाँधी की ही सभाएँ हुई हैं.
मध्य प्रदेश
भारत के बीचों बीच देश का सबसे बड़ा राज्य मध्यप्रदेश है.
1993 से 1998 की पिछली दो विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने चुनाव जीतकर सत्ता हासिल की थी और पूरे 10 साल कांग्रेस के मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह ने शासन किया
टक्कर इस बार ऐसी है कि पिछले 8 चुनाव देखने वाले भी कहते हैं कि मुकाबला ऐतिहासिक है.
पत्रकार महेश पांडे के अनुसार ये मुकाबला इसलिए भी रोचक है क्योंकि मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह घोषणा कर चुके हैं कि यदि वे चुनाव हार गए तो दस साल तक कोई पद नहीं लेंगे.
उधर भाजपा की मुख्यमंत्री पद की दावेदार उमा भारती चुनाव जीतती हैं तो संन्यासिन राजा की कुर्सी संभालेगी और राजा दिग्विजयसिंह सन्यास लेंगे.
राज्य विधानसभा की 230 सीटों के लिए कांग्रेस ने 229 उम्मीदवार खड़े किये हैं और एक सीट रिपब्लिकन पार्टी के लिये छोड़ी है.
भाजपा ने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। बहुजन समाज पार्टी ने 160 सीटों पर और समाजवादी पार्टी ने 160 सीटों पर चुनाव लड़ रही है.
समाजवादी पार्टी ने आत्मसमर्पित डकैत से लेकर किन्नर कमलाजान सबको टिकट दिया है.
ऐसा लगता है कि भाजपा ने मध्यप्रदेश में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है.
भाजपा के प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के मध्यप्रदेश में तीन चक्कर लगे और 5 सभाएं हुई. उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के 4 चक्कर मध्यप्रदेश में लगे और उन्होंने एक दर्जन सभाओं को संबोधित किया.
वैकेया नायडू के भी 4 चक्कर लगे और एक दर्जन से ज्यादा सभाएं लीं. फिर मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज, प्रमोद महाजन, जार्ज फर्नान्डीज, नीतिश कुमार, अर्जुन मुंडा, संजय पासवान और नरेन्द्र मोदी.
कांग्रेस की तरफ से कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी का मध्यप्रदेश में तीन चक्कर लगे और उन्होंने 10 सभाओं को संबोधित किया. मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह खुद रोज 15 से 20 सभाएं लेते रहे.
पूर्व लोकसभा अध्यक्ष शिवराज पाटिल, प्रणव मुखर्जी, अम्बिका सोनी, पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह, हिमाचल के मुख्यमंत्री वीरभद्रसिंह, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे, सलमान खुर्शीद और गुलामनबी आजाद को चुनाव प्रचार लिए पार्टी ने खड़ा किया.
भारतीय जनता पार्टी ने दस साल की राज्य की दिग्विजयसिंह सरकार की विफलताओं को निशाना बनाया.
"बिजली की कमी और गड्डों वाली सड़क" पीने का पानी, बेरोजगारी चुनाव के मुख्य मुद्दे बन गए.
उधर कांग्रेस नेता यह मानते रहे कि सड़क और बिजली में सरकार की ओर से कमी रह गई.
लेकिन कांग्रेस ने विकेंद्रीकरण और महिला सशक्तिकरण की उपलब्धि.
छत्तीसगढ़
इस नए राज्य के चुनाव ने इस बार चार राज्यों के चुनाव को एक नया मुद्दा दे दिया.
यहाँ भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री पद के अघोषित उम्मीदवार दिलीप सिंह जूदेव की रिश्वत लेते हुए फ़िल्म को सभी राज्यों में उछाला गया.
लेकिन छत्तीसगढ़ में एक ही मुद्दा था, अजीत जोगी.
कांग्रेस अपने इस मुख्यमंत्री के काम पर वोट माँगती रही.
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने भी अपनी रैलियों में यही कहा.
उधर भाजपा ने अपना प्रचार अजीत जोगी और उनके बेटे के ख़िलाफ़ केंद्रित रखा.
यहाँ तक कि जूदेव की रिश्वत लेते हुए फ़िल्म को भी जोगी का कारनामा बताया गया.
90 सीटों वाली इस विधानसभा में अजीत जोगी 48 विधायकों के साथ राज्य बनने के बाद सत्ता में आए थे लेकिन भाजपा और बसपा को तोड़कर इस समय वे 63 विधायकों के साथ सरकार चला रहे थे.
यहां कांग्रेस के पुराने नेता विद्याचरण शुक्ल राष्ट्रवादी कांग्रेस में चले गए हैं और माना जा रहा है कि वे कुछ सीटों पर प्रभाव डालेंगे.