मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में लड़ाई सत्तारूढ़ कांग्रेस और विपक्षी भारतीय जनता पार्टी के बीच सिमटी बताई जा रही है मगर दोनों के लिए सिरदर्द बन गए हैं इस जंग में उतरे किन्नर.
यही वह प्रदेश है जिसने पहली बार 1999 में शबनम मौसी को विधायक बनाकर किन्नरों की राजनीतिक महत्त्वाकाँक्षा को हवा दी.
इस चुनाव में 108 किन्नर 'जीती जिताई पार्टी' नाम से एक बैनर तले चुनाव में उतरे हैं.
शबनम मौसी की जीत के बाद उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में आशा देवी ने ज़बरदस्त जीत दर्ज़ करते हुए मेयर की सीट पर क़ब्ज़ा कर लिया था.
'काम हुआ है'
शबनम मौसी के बारे में स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने क्षेत्र के विकास के लिए काफ़ी काम किया है.
इसी तरह भोपाल की एक विधानसभा सीट से सुरैया प्रत्याशी हैं और उन्होंने भी क्षेत्र में प्रमुख प्रत्याशियों की नींद उड़ा रखी है.
इन लोगों ने पार्टी का ये नाम क्यों चुना है इस बारे में सुरैया कहती हैं, "हमने पार्टी का ये नाम इसलिए रखा है क्योंकि हम जहाँ भी जा रहे हैं लोग कहते हैं कि आप वोट क्यों माँग रहे हैं आपको तो वोट मिलने ही हैं."
उनका चुनाव निशान किताब है और वह कहती हैं कि इस तरह उनकी पार्टी शिक्षा के मुद्दे पर ज़ोर देना चाहती है.
वह कहती हैं, "आप आदमियों और औरतों को देख चुके हैं अब हमें देखिए."
इन लोगों का कहना है, "राजनीतिज्ञों ने आपको धोखा दिया है. अब आप हमें आजमाइए और देखिए कि हम आपके लिए क्या कर सकते हैं."
इनका दावा है कि चूँकि उनका कोई परिवार ही नहीं है इसलिए वे सिर्फ़ समाज के लिए और आम लोगों के बारे में ही सोचेंगे.
शबनम मौसी के विवादास्पद चुनाव के बाद भारत के चुनाव आयोग ने कहा था कि किन्नरों को पुरुष या महिला में से किसी एक के तौर पर ही चुनाव लड़ना होगा.
लोग भी इन किन्नरों के चुनाव में उतरने से उत्साहित हैं और ऐसे ही एक मतदाता कृष्ण कुमार राठौड़ का कहना है, "मेरे लिए ये मायने नहीं रखता कि वह पुरुष है या स्त्री या कोई भी. इन नालियों की स्थिति देखिए."
सुरैया के लिए चुनावी जंग सिर्फ़ भोपाल तक ही सीमित नहीं है और उनका कहना है कि वह एक राष्ट्रीय पार्टी बनाना चाहती हैं.