भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम में बिहार से आकर बसे लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा की लहर चल पड़ी है.
इसने एक बार फिर पूर्वोतर राज्यों में जातीय तनाव को उजागर कर दिया है.
मौजूदा हिंसा की शुरूआत कैसे हुई?
कुछ दिनों पहले बिहार के लोग भारतीय रेलवे के पूर्वोत्तर फ़्रंटियर डिविज़न के लिए परीक्षा देने असम पहुँचे तो उन्हें मार कर भगा दिया गया था.
इस बारे में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन या आसू का कहना था कि इन नौकरियों के लिए बहुत कम संख्या में स्थानीय लोगों को बुलाया गया था और अधिकतर उम्मीदवार बिहार के थे.
इसके जवाब में असम जा रही दो रेलगाड़ियों पर बिहार के दो स्टेशनों पर हमले हुए जिनमें कई लोग घायल हो गए.
इसके बाद असम में बिहार से आए मज़दूरों को निशाना बनाया जाने लगा.
कौन लोग इस हिंसा के पीछे हो सकते हैं?
सुरक्षाबल इसके लिए अलगाववादी विद्रोही संगठन यूनाइटेड लिबरेशन फ़्रंट ऑफ़ असम (उल्फ़ा) को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं.
उल्फ़ा विद्रोही अर्से से हिंदी भाषियों से राज्य छोड़ने की माँग करते आए हैं.
उत्तर-पूर्वी राज्य इतने अशांत क्यों हैं?
ब्रिटिश शासन से पहले भारत का कोई भी शासक दूरदराज के उत्तर पूर्वी इलाक़ों पर नियंत्रण करने में सफल नहीं हो पाया था.
इस कारण यह क्षेत्र लगभग स्वतंत्र रहा.
साथ ही पूर्वोतर राज्य भारत के अन्य हिस्सों की तुलना में सांस्कृतिक और पारंपरिक रूप से काफ़ी भिन्न हैं.
नगालैंड, मिज़ोरम, मणिपुर और असम में अलगाववादियों ने इसी बात का फ़ायदा उठाया और भारतीय नियंत्रण को चुनौती दी.
पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में अलगाव की माँग ने ज़ोर पकड़ा है.
भारत सरकार इससे कैसे निपट रही है?
भारत सरकार ने विद्रोहियों को दबाने के लिए सेना की मदद ली है.
लेकिन सैनिक कमांडर स्वीकार करते हैं कि इस समस्या का केवल राजनीतिक समाधान हो सकता है.
साथ ही भारत सरकार ने कई विद्रोही संगठनों के साथ बातचीत की भी शुरुआत की है.
प्रेक्षकों का मानना है कि पहले की तुलना में भारत सरकार का रवैया काफ़ी लचीला है.
भारत सरकार ने इस क्षेत्र के विकास के लिए काफ़ी धन मुहैया कराया है लेकिन स्थानीय लोगों की शिकायत है कि भ्रष्टाचार के कारण विकास नहीं हो पा रहा है.
विद्रोहियों के संपर्क क्या भारत से बाहर भी हैं?
ये संघर्ष वैसे तो भारत तक ही सीमित है लेकिन उत्तर-पूर्व के विद्रोहियों के संपर्क भारत के पड़ोसी देशों बर्मा, बांग्लादेश और भूटान में भी हैं.
अलगाववादियों को इन देशों के पर्वतीय इलाक़ों में पनाह भी मिलती है.
क्या उम्मीद की कोई किरण है?
केंद्र सरकार ने मिज़ोरम के अलगाववादियों के साथ 1986 में शांति समझौता किया.
नगालैंड में भी अलगाववादियों के साथ पिछले कुछ वर्षों से बातचीत चल रही है.
दरअसल, पिछले 50 वर्षों की हिंसा से लोग थक चुके हैं और अब शांति चाहते हैं.