मिज़ोरम में पहली बार विधानसभा चुनाव हुआ 1972 में.
तब मिज़ोरम केंद्र शासित प्रदेश था और विधानसभा की तब 30 सीटें हुआ करती थीं जो अब बढ़कर 40 हो गई हैं.
पहले चुनाव में बस दो ही पार्टियाँ चुनाव लड़ रही थीं - काँग्रेस और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी.
इसके अलावा बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवार भी चुनाव लड़ रहे थे.
पहले चुनाव में काँग्रेस को छह सीटें मिली जबकि संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली.
24 सीटें निर्दलीय उम्मीदवारों के क़ब्ज़े में गईं और सी छुंगा राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने जो ख़ुद निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीतकर आए थे.
1978 का चुनाव
दूसरा चुनाव हुआ 1978 में जिसमें केवल एक ही पार्टी - पीपुल्स काँफ़्रेंस - मैदान में थी. बाकी उम्मीदवार निर्दलीय थे.
पीपुल्स काँफ़्रेंस ने 28 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे जिनमें से 22 जीत गए.
8 सीटें निर्दलीय उम्मीदवारों के पास गईं.
राज्य में पीपुल्स काँफ़्रेंस की सरकार बनी और ब्रिगेडियर टी साइलो राज्य के दूसरे मुख्यमंत्री बने.
मगर साइलो की सरकार 5 महीने ही चली थी जब राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा देना पड़ा.
1979 का चुनाव
मिज़ोरम में साल भर बाद ही फिर विधानसभा चुनाव हुए.
इस चुनाव में पीपुल्स कॉंफ्रेंस के अलावा काँग्रेस और जनता पार्टी भी मैदान में थे.
चुनाव में सबसे आगे रही पीपुल्स कॉंफ्रेंस जिसे 18 सीटें मिलीं.
काँग्रेस को पाँच, जनता पार्टी को दो और निर्दलीय उम्मीदवारों को पाँच सीटें मिलीं.
ब्रिगेडियर टी साइलो एक बार फिर राज्य के मुख्यमंत्री बने और इस बार उनकी सरकार पूरे पाँच साल तक चली.
1984 का चुनाव
1984 के चुनाव में टक्कर बस दो पार्टियों की थी - काँग्रेस और पीपुल्स काँफ़्रेंस. निर्दलीय उम्मीदवार भी मैदान में थे.
काँग्रेस और पीपुल्स काँफ्रेंस ने मिलकर चुनाव लड़ा था.
काँग्रेस को 20 सीटों पर, पीपुल्स काँफ्रेंस को आठ और निर्दलीय उम्मीदवारों को दो सीटों पर जीत मिली.
काँग्रेस के नेता ललथनहावला मिज़ोरम के मुख्यमंत्री बने और ये गठबंधन सरकार दो साल से अधिक समय तक चली.
फिर मिज़ोरम को राज्य का दर्जा देने की सरगर्मी शुरू हुई और 1961 से मिज़ोरम की आज़ादी के लिए हिंसक आँदोलन चला रहे मिज़ो नेशनल फ़्रंट के नेता लालडेंगा राज्य के मुख्यमंत्री बने.
मिज़ोरम 20 फ़रवरी 1987 को औपचारिक तौर पर राज्य बन गया.
1987 का चुनाव
मिज़ोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने के बाद 1987 में पहली बार मिज़ोरम विधानसभा की 40 सीटों के लिए चुनाव हुआ.
मैदान में थे काँग्रेस और पीपुल्स काँफ्रेंस.
काँग्रेस को 13 , पीपुल्स काँफ़्रेंस को तीन और निर्दलीय उम्मीदवारों को 24 सीटें मिलीं.
लालडेंगा ख़ुद निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीते और एक बार फिर वो राज्य की गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री बने.
1989 का चुनाव
1989 के मिज़ोरम विधानसभा चुनाव में पार्टियाँ थीं - काँग्रेस, पीपुल्स काँफ़्रेंस और मिज़ो नेशनल फ़्रंट.
काँग्रेस को 23, एमएनएफ़ को 14, पीपुल्स काँफ़्रेंस को एक और निर्दलीय उम्मीदवारों को दो सीटें मिलीं.
राज्य में काँग्रेस की सरकार बनी और ललथनहावला राज्य के मुख्यमंत्री बने.
1993 का चुनाव
1993 के विधानसभा चुनाव मे मुख्य पार्टियाँ थीं - काँग्रेस, भारतीय जनता पार्टी और मिज़ो नेशनल फ़्रंट.
काँग्रेस को 16, एमएनएफ़ को 14 और निर्दलीय उम्मीदवारों को 10 सीटें मिलीं जबकि भाजपा खाता नहीं खोल सकी.
निर्दलीय उम्मीदवारों के समर्थन से काँग्रेस ने फिर सरकार बनाई और ललथनहावला फिर राज्य के मुख्यमंत्री बने.
1998 का चुनाव
1998 के चुनाव में मिज़ोरम में कई पार्टियाँ मैदान में थीं.
राष्ट्रीय पार्टियों की ओर से काँग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, जनता दल और समता पार्टी चुनाव लड़ रहे थे.
राज्य स्तर की पार्टियों में मिज़ो नेशनल फ़्रंट, लोकशक्ति और राष्ट्रीय जनता दल के उम्मीदवार अपनी किस्मत आज़मा रहे थे.
इसके अलावा तीन ग़ैर मान्यता प्राप्त पार्टियाँ भी थीं जिनमें मिज़ो पीपुल्स काँफ़्रेंस काफ़ी महत्वपूर्ण थी जिसका तालमेल मिज़ो नेशनल फ़्रंट के साथ था.
चुनाव में एमएनएफ़-एमपीसी गठबंधन को एकतरफ़ा जीत मिली जिन्होंने 40 में से 33 सीटों पर जीत पाई.
काँग्रेस को बस छह सीटें मिलीं.
राज्य में एमएनएफ़-एमपीसी गठबंधन की सरकार बनी और एमएनएफ़ नेता ज़ोरामथांगा राज्य के मुख्यमंत्री बने.