श्रीलंका की राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा के क़दमों के बाद वहाँ शांति प्रक्रिया को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है.
राष्ट्रपति का कहना है कि नॉर्वे के मध्यस्थों को उनकी ज़िम्मेदारियों की सीमा के बारे में स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए जाने चाहिए.
इस बीच नॉर्वे के विदेश उपमंत्री विदार हेलगेसन सोमवार को श्रीलंका पहुँच रहे हैं जहाँ वह सरकार और लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम के विद्रोहियों से बातचीत करेंगे.
इस बातचीत के ज़रिए अगले दौर की बातचीत के बारे में विचार-विमर्श होगा.
उल्लेखनीय है कि नॉर्वे श्रीलंका सरकार और तमिल विद्रोहियों के बीच बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है.
मगर बीबीसी संवाददाता फ़्रैंसेस हैरिसन के अनुसार अभी यह स्पष्ट नहीं है कि नॉर्वे के मध्यस्थों की भूमिका में बदलाव का तमिल विद्रोहियों पर क्या असर होगा.
राष्ट्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति कुमारतुंगा ने कहा कि संघर्ष विराम तो जारी रहेगा मगर नॉर्वे के मध्यस्थों को अब उनकी ज़िम्मेदारियों की स्पष्ट सीमा के बारे में बताया जाएगा.
ऐसा लगता है कि राष्ट्रपति के अनुसार नॉर्वे के मध्यस्थ अपनी सीमारेखा पार कर रहे थे और वह इसे पसंद नहीं कर रहीं.
प्रक्रिया जारी रहेगी
इसी बीच उनका ये भी कहना था कि प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे से कहा जाएगा कि वह शांति प्रक्रिया जारी रखें.
मगर इस अजीब सी स्थिति में देखना होगा कि विक्रमसिंघे तमिल टाइगर्स से कैसे बात करते हैं जबकि सेना के ऊपर उनका कोई नियंत्रण ही नहीं हो.
राष्ट्रपति ने देश की सुरक्षा की सारी ज़िम्मेदारी अपने हाथों में ले ली है और उनका कहना है कि अब वह उसे छोड़ने का कोई इरादा नहीं रखतीं.
इसी तरह राष्ट्रपति कुमारतुंगा यदि विद्रोहियों से विचार-विमर्श किए बग़ैर ही नॉर्वे के मध्यस्थों की भूमिका में बदलाव करती हैं तो इससे तमिल विद्रोही नाराज़ भी हो सकते हैं.
राष्ट्रपति से तो उनका पुराना बैर-भाव रहा भी है और वे तो उनकी जान लेने की कोशिश भी कर चुके हैं.
तमिल विद्रोहियों का आरोप है कि राष्ट्रपति कुमारतुंगा के शासन में तमिल नागरिकों के मानवाधिकारों का हनन हुआ है.