श्रीलंका के मुख्य विपक्षी दल ने फ्रीडम पार्टी ने जातीय समस्या को हल करने के लिए एक अंतरिम प्रशासन की स्थापना के तमिल विद्रोहियों के प्रस्तावों पर गहरी चिंता जताई है.
श्रीलंका फ्रीडम पार्टी ने हालाँकि यह नहीं कहा है कि क्या इन प्रस्तावों के आधार पर सरकार और तमिल विद्रोहियों के बीच कोई बातचीत होनी चाहिए या फिर इन प्रस्तावों को सिरे से ख़ारिज कर देना चाहिए.
ग़ौरतलब है कि तमिल विद्रोहियों के संगठन लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (एलटीटीई) ने पिछले सप्ताह एक दस्तावेज़ नॉर्वे के दूत के माध्यम से सरकार तक पहुँचाया है जिसमें पूर्वोत्तर क्षेत्र में एक अंतरिम प्रशासन का प्रस्ताव रखा गया है.
दस्तावेज़ के अनुसार पूर्वोत्तर क्षेत्र में तमिल विद्रोहियों ने एक तरह से अपनी संप्रभुता की माँग रख दी है.
सरकार ने इन प्रस्तावों पर असंतोष तो व्यक्त किया है लेकिन उम्मीद भी जताई है कि इसके आधार पर बातचीत फिर से शुरु हो सकती है.
इन प्रस्तावों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वागत हुआ था क्योंकि वर्षों के ख़ून-ख़राबे के बाद शांति की किरण नज़र आ रही है.
लेकिन पूर्वोत्तर क्षेत्र में एक अंतरिम प्रशासन की स्थापना के लिए संविधान में संशोधन की ज़रूरत होगी जिसके लिए सरकार को विपक्ष के सहयोग लेना ज़रूरी होगा.
फ्रीडम पार्टी
फ्रीडम पार्टी ने इन प्रस्तावों पर चिंता तो जताई है लेकिन ऐसा लगता है कि इस मुद्दे पर ख़ुद पार्टी में भी मतभेद हैं.
पार्टी ने इन प्रस्तावों पर मीडिया के सामने अपनी राय रखने के लिए दो बार संवाददाता सम्मेलन की घोषणा की लेकिन स्थगित कर दिया गया.
अब पार्टी ने एक लंबा बयान जारी किया है जिसमें चिंता व्यक्त की गई है कि तमिल विद्रोही अंतरिम प्रशासन को अपना एक स्वतंत्र राज्य बनाने की दिशा में एक साधन के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं.
फ्रीडम पार्टी का कहना है कि तमिल विद्रोही सरकार चलाने के लिए बिना किसी रोकटोक के अधिकार चाहते हैं जिससे एक आज़ाद राज्य का रास्ता निकल सकता है.
पार्टी का कहना है कि अगर विद्रोहयों को समुद्री क्षेत्र पर भी अधिकार दिया गया तो इससे अंतरराष्ट्रीय जन परिवहन और भारतीय क्षेत्र की सुरक्षा को ख़तरा पैदा हो सकता है.
लेकिन पार्टी ने इस बारे में सिर्फ़ अपनी चिंताएं जताई हैं और सरकार को क्या रूख़ अपनाना चाहिए, इस बारे में कुछ नहीं कहा है.