श्रीलंका सरकार ने कहा है कि तमिल विद्रोहियों ने शांति के लिए जो प्रस्ताव रखे हैं वे सरकार की मूल योजना से कुछ अलग हैं लेकिन इससे शांति वार्ता फिर से शुरु होने की उम्मीद बँधती है.
तमिल विद्रोहियों ने शुक्रवार को ये शांति प्रस्ताव नॉर्वे के दूत के ज़रिए सरकार को सौंपे हैं.
इस प्रस्तावों में विद्रोहियों के नियंत्रण वाले पूर्वोत्तर क्षेत्र में अंतरिम प्रशासन की स्थापना के बारे में कुछ सुझाव दिए गए हैं.
प्रस्तावों में कहा गया है कि पाँच साल में चुनाव कराए जाएंगे जिसमें एक मानवाधिकार संगठन और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के संरक्षण की व्यवस्था होगी.
तमिल विद्रोहियों के नियंत्रण वाले क्षेत्र में सिंहली और मुस्लिम भी हैं लेकिन बहुसंख्या में तमिल ही हैं.
इस बीच समस्या के राजनीतिक समाधान के लिए बातचीत जारी रह सकती है.
बीबीसी की कोलंबो संवाददाता फ्रांसिस हैरिसन का कहना है कि इन प्रस्तावों में सबसे ज़्यादा विवादास्पद माँग ये है कि विद्रोहियों को समुद्री क्षेत्र का बिना किसी बाधा के इस्तेमाल करने की इजाज़त दी जाए.
जबकि सरकार और नौसेना को डर है कि विद्रोही हथियारों की तस्करी के लिए जल क्षेत्र का दुरुपयोग कर सकते हैं.
लेकिन कुल मिलाकर सरकार इन प्रस्तावों से इस आधार पर कुछ राहत महसूस करती नज़र आ रही है कि विद्रोहियों ने ज़्यादा माँगें नहीं रखी हैं.
ख़ुद सरकार का कहना है कि दोनों पक्षों के बीच हालाँकि मतभेद बरक़रार हैं लेकिन यह उम्मीद ज़रूर बंधी है कि बातचीत आगे बढ़ेगी जिससे रास्ता निकलेगा.
प्रस्ताव
विद्रोहियों ने कुछ और भी माँगें रखी हैं जिनमें अंतरराष्ट्रीय सहायता को ख़र्च करने का अधिकार शामिल है.
उनका यह भी कहना है कि उन्हें विदेशों से क़र्ज़ लेने, कर वसूलने और अपने नियंत्रण वाले क्षेत्र पर क़ानून और व्यवस्था लागू करने का भी अधिकार हो.
लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया है कि यह किस तरह से हो सकता है.
इसके अलावा उन्होंने पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए स्वतंत्र न्यायिक संस्थाओं की भी माँग की है जिनके बारे में संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि इस मुद्दे पर मौजूदा संविधान के तहत समस्या खड़ी हो सकती है.
विद्रोहियों की यह भी माँग है कि पूर्वोत्तर क्षेत्र में श्रीलंका की सेना ने जिन इमारतों पर नियंत्रण कर रखा है उन्हें ख़ाली किया जाए और इन इमारतों का इस्तेमाल लोगों के पुनर्वास के लिए किया जाएगा.
इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच व्यापक मतभेद हैं क्योंकि इससे उस क्षेत्र में सैनिक शिविरों की सुरक्षा ख़तरे में पड़ सकती है.