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रायबरेली विशेष अदालत के फ़ैसले पर रोक

उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में अशोक सिंघल सहित भाजपा और विश्व हिंदू परिषद के छह नेताओं पर आरोप तय करने के फ़ैसले पर चार नवंबर तक के लिए रोक लगा दी है.

रायबरेली की विशेष अदालत ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में इन नेताओं के ख़िलाफ़ आरोप तय करने का आदेश दिया था.

लेकिन उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को इस मामले में बरी कर दिया था.

कोर्ट ने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी सहित छह अन्य नेताओं के ख़िलाफ़ आरोप तय करने का आदेश दिया था.

इनमें मुरली मनोहर जोशी के साथ-साथ उमा भारती, विनय कटियार, अशोक सिंघल, विष्णु हरि डालमिया, आचार्य गिरिराज किशोर और साध्वी ऋतंभरा शामिल हैं.

हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने पहले ही मुरली मनोहर जोशी के मामले में भी फ़ैसले पर रोक लगा दी थी.

गुरुवार को बाक़ी नेताओं के ख़िलाफ़ भी मामले पर रोक लगा दी गई.

मुरली मनोहर जोशी ने तो आरोप तय करने के फ़ैसले के बाद इस्तीफ़ा भी दे दिया था, जिसे बाद में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ठुकरा दिया.

लेकिन आडवाणी को बरी कर दिए जाने के फ़ैसले पर विपक्षी दलों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी और कहा कि सरकार को इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करनी चाहिए.

मुक़दमा

छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी गई थी.

बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद देश भर में भड़की सांप्रदायिक हिंसा में क़रीब दो हज़ार लोग मारे गए थे.

बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बारे में दो अलग-अलग मामलों की सुनवाई के लिए लखनऊ और रायबरेली में दो विशेष अदालतें गठित की गई थीं.

पहले इस मामले में आडवाणी सहित 49 लोगों के ख़िलाफ़ लखनऊ में मुकदमा चल रहा था.

लेकिन उच्च न्यायालय ने आठ शीर्ष हिंदू राष्ट्रवादी नेताओं से संबंधित मामले को अलग कर दिया.

पिछले कुछ महीनों में सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी कांड के सभी मामलों की सुनवाई लखनऊ में कराने की दो याचिकाओं को ख़ारिज किया है.

दूसरी ओर लखनऊ की विशेष अदालत ने बाक़ी व्यक्तियों के ख़िलाफ़ आरोप दायर कर दिए हैं मगर मुक़दमा अभी तक शुरू नहीं हो सका है.