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सोमवार, 26 जनवरी, 2009 को 15:00 GMT तक के समाचार

मार्क टली
बीबीसी के पूर्व संवाददाता

'सहायता संगठनों पर भरोसा करे बीबीसी'

बीबीसी ये कैसे समझती है कि सहायता की अपील और न्यूज़ कवरेज एक ही बात है. इस मामले में दो अलग-अलग मुद्दे हैं. एक मुद्दा है सहायता और दूसरा मुद्दा है आप समाचार कैसे कवर करते हैं.

मेरा ख़्याल है कि दोनों को अलग रखा जा सकता है.

ग़ज़ा में मदद सही लोगों तक नहीं पहुँच पाने को लेकर बीबीसी की आशंका के बारे में मैं कह सकता हूँ कि ये बीबीसी का फ़ैसला नहीं सरकार और ऑक्सफ़ैम जैसे संगठनों का फ़ैसला है.

क्या है ये विवाद

बीबीसी को ये फ़ैसला लेने की कोई ज़रूरत नहीं है. बीबीसी को ऑक्सफ़ैम जैसी संस्थाओं पर भरोसा रखना चाहिए. बीबीसी ऑक्सफ़ैम जैसी संस्थाओं की ओर से फ़ैसला नहीं ले सकती.

ऑक्सफ़ैम या क्रिश्चियन एड जैसी संस्थाओं से पैसा उचित लोगों तक पहुँचता है या नहीं, इस पर बीबीसी को फ़ैसला लेने की कोई ज़रूरत नहीं है.

तर्क

ग़ज़ा में सहायता के लिए अपील पर बीबीसी का ये तर्क मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि इससे उसकी निष्पक्षता प्रभावित होगी.

लोग समझते हैं कि बीबीसी निष्पक्ष समाचार पेश करती है. ये अलग बात है और इस निष्पक्षता को बचाए रखना ज़रूरी भी है.

लेकिन जब बीबीसी किसी चैरिटी के लिए अपील करती है, तो वो ख़बर नहीं है, समाचार नहीं है. वो बिल्कुल अलग बात है.

मैं नहीं मानता कि ऐसा फ़ैसला करने के लिए बीबीसी पर कुछ संगठनों और सरकार का दबाव है. मैं नहीं समझता कि बीबीसी ने किसी दबाव में ऐसा फ़ैसला किया है.

मैंने 30 साल बीबीसी में काम किया है. मेरा ऐसा अनुभव है और मैंने ऐसा कभी नहीं देखा कि बीबीसी ने सरकार की राय सुनने के बाद अपना फ़ैसला किया. बीबीसी सरकार की राय सुनती है लेकिन इस आधार पर फ़ैसला नहीं करती.

(बीबीसी संवाददाता मुकेश शर्मा से बातचीत पर आधारित)