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गुरुवार, 30 अक्तूबर, 2008 को 11:45 GMT तक के समाचार

ब्रजेश उपाध्याय
बीबीसी संवाददाता, वाशिंगटन

अमरीका में नफ़रत की राजनीति

पश्चिमी देशों में अक्तूबर के महीने में 'हैलोवीन' का त्योहार मनाया जाता है. लोग 31 अक्तूबर की शाम को डरावनी शक्ल बनाकर और मुखौटे पहनकर घरों के दरवाज़े खटखटाकर चॉकलेट्स माँगते हैं.

जिसने चॉकलेट दे दिया वह बच गया, जिसने नहीं दिया उसे डराने की कोशिश की जाती है.

कह सकते हैं कि यहाँ की राजनीति में भी इन दिनों कुछ 'हैलोवीन' जैसा ही माहौल है.

कई इलाक़ों में मतदाताओं में डर पैदा करने की कोशिश नज़र आ रही है या उनमें पहले से मौजूद डर को हवा दी जा रही है.

ओबामा के नाम

इस ख़ौफ़ का नाम कुछ भी हो सकता है मसलन काला, मुसलमान, चरमपंथी या फिर बराक हुसैन ओबामा.

मैकेन या पेलिन की रैली में आए कई लोगों ने ओबामा को इन नामों से बुलाया है और इस तरह के नारे लगाए हैं.

थोड़ी देर के लिए इन आवाज़ों को शायद एक छोटे से नासमझ तबके का गुस्सा कहकर नज़रअंदाज़ किया जा सकता है लेकिन कई मंच हैं जहां रिपब्लिकन सोच रखने वाले कुछ अधिकारी इस तरह की बातों को हवा देने की कोशिश करते नज़र आए.

पेंसिलवेनिया में रिपब्लिकन पार्टी के एक उच्च अधिकारी बिल प्लैट ने अपने भाषण में कहा कि सोचिए पांच नवंबर की सुबह जब आप सो कर उठेंगे और न्यूज़ में सुनेंगे कि बराक हुसैन ओबामा आपके राष्ट्रपति बन गए हैं तो आपको कैसा लगेगा.

लेकिन अगर किसी के नाम में हुसैन लगा हुआ है तो उसमें डरनेवाली ऐसी कौन सी बात है?

सेंटर फ़ॉर अमेरिकन प्रोग्रेस नाम के थिंक टैंक में काम करनेवाले शॉन गिबंस कहते हैं कि इसका उद्देश्य दो तरह का है.

उनका कहना है, "यह कुछ लोगों को शायद सद्दाम हुसैन की याद दिलाता है, दूसरा यह दिखाता है कि बराक ओबामा यहाँ के लोगों से अलग हैं, उनकी सोच अलग है, उनपर विश्वास नहीं किया जा सकता."

वोटरों का डर

जिस तबके के बारे में वे बात कर रहे हैं उसे व्हाइट हाउस में एक काले राष्ट्रपति को स्वीकार करने में ही थोड़ी परेशानी होती और अगर वह मुसलमान भी हो तो वह परेशानी ख़ौफ़ में बदल जाती है.

कई रिपब्लिकन रैलियों में लोग अपना डर खुलकर सामने रख रहे हैं. कोई कहता है कि वे अरब हैं तो कोई उनके बारे में पूरी छानबीन नहीं किए जाने की बात करता है.

जॉन मैकेन ने ज़रूर उनके डर को बेबुनियाद बताया है लेकिन कई रूढ़िवादी नेता हैं जो इस डर को ग़लत नहीं मानते हैं.

इसाई रूढ़िवादी संस्था अमेरिकन वैल्यूज़ के अध्यक्ष गैरी बोअर रिपब्लिकन वोटरों में खासी दख़ल रखते हैं. उनका कहना है कि बराक ओबामा के बारे में जो डर है वह बेबुनियाद नहीं है.

गैरी बोअर कहते हैं कि किसे पता है कि ओबामा का ताल्लुक चरमपंथी इस्लाम से नहीं था.

वह कहते हैं, "ओबामा इंडोनेशिया में एक मदरसे में पढ़ चुके हैं, किसी को नहीं मालूम कि उन्हें वहाँ कैसी शिक्षा दी गई. कई लोग जो उस स्कूल में थे उनका कहना है कि वह बिल्कुल वैसा ही मदरसा था जहाँ कि शिक्षा आज दुनिया के लिए चिंता का विषय बनी हुई है."

और इस तरह की सोच पिछले दिनों मुझे अमरीका के कई हिस्सों में देखने-सुनने को मिली.

लेकिन जब यहाँ के सारे सर्वेक्षण बता रहे हों कि बराक ओबामा मैकेन से काफ़ी आगे चल रहे हैं तो ज़ाहिर है हर नस्ल और रंग के लोग उन्हें वोट दे रहे होंगे. फिर बराक ओबामा को किस बात का डर हो सकता है?

'ब्रैडली इफ़ेक्ट' का यानि कि जैसा 1982 में हुआ. कैलिफ़ोर्निया में गवर्नर के पद के लिए अफ़्रीकी अमरीकी या काले उम्मीदवार टॉम ब्रैडली के साथ हुआ. गोरे वोटरों ने ओपिनियन पोल में तो कहा कि उन्हें वोट देंगे, चुनाव के एक दिन पहले तक वे अच्छे ख़ासे अंतर से आगे चल रहे थे, लेकिन जब गोरे वोटर पोलिंग बूथ के अंदर पहुँचे तो उन्होंने गोरे उम्मीदवार को ही वोट दिया. क्या अब भी ऐसा हो सकता है कि गोरे वोटर कह कुछ और रहे हों, करेंगे कुछ और?

महँगा प्रचार

प्रोफ़ेसर राजन आनंद ओबामा के चुनाव प्रचार से जुड़े हुए हैं. उनका कहना है कि इसे पूरी तरह से नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है.

कई लोगों का मानना है कि अमरीका के कई इलाकों में आज भी जब वोटर बैलट पेपर पर मुहर लगाएगा या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का बटन दबाएगा तो उसके दिमाग में बराक ओबामा का नाम, उनका रंग, उनकी नस्ल की बात ज़रूर उठेगी.

इसके असर को ख़त्म करने के लिए बराक ओबामा अंधाधुंध पैसा खर्च कर रहे हैं टेलिविज़न पर एयर टाइम खरीदने में. पूरे देश में कई टीवी चैनल पर बराक ओबामा, उनके परिवार और उनकी पढ़ाई-लिखाई के बारे में लोगों को बताने के लिए आधे-आधे घंटे के विज्ञापन दिखाए जा रहे हैं.

कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि कुछ हद तक ओबामा भी 'रेस कार्ड' खेल रहे हैं लोगों से अपने रंग, अपने नस्ल के बारे में बात करके. ज़्यादातर काले वोटरों का भी केवल ओबामा के लिए वोट डालना एक तरह के रंगभेद की तरह ही देखा जा रहा है.

अगर बराक ओबामा चुनाव हार जाते हैं तो यह कहना शायद ज़्यादती होगी कि अमरीका ने उन्हें केवल काले होने की वजह से स्वीकार नहीं किया, लेकिन एक तबके के लिए यह एक बड़ा कारण रहा होगा इससे शायद ही कोई इनकार करे.