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सोमवार, 15 सितंबर, 2008 को 04:25 GMT तक के समाचार

ब्रजेश उपाध्याय
बीबीसी संवाददाता, वॉशिंगटन

अमरीकियों की नब्ज़ टटोलने की कोशिश

अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव को अब मुश्किल से छह हफ़्ते रह गए हैं.

वैसे तो हम इस चुनाव के उतार चढाव, बहस, बयानबाज़ी, रंग और माहौल आप तक पहुंचाते रहे हैं लेकिन इस बार हमारी कोशिश कुछ अलग तरह की है.

इस 10 सितंबर से एक ख़ास कोशिश के तहत बीबीसी की एक चुनावी बस चली है जिसका ध्येय है अमरीका से बात करना और अमरीकी वोटरों की नब्ज़ टटोलना.

लॉंस एंजेल्स से लॉंग आइलैंड तक यानि अमरीका के एक छोर से दूसरे छोर तक की यात्रा आमतौर पर ऐसी लगती है जैसे आप एक साथ कई देशों की यात्रा कर रहे हों.

कितना बड़ा है ये देश इसका अंदाज़ा केवल इससे लगाया जा सकता है कि पूरा देश तीन अलग अलग टाइम ज़ोन में बंटा हुआ है यानि अलग अलग कोनों में घड़ी की सुई अलग अलग वक्त बताती है.

और बीबीसी की ये चुनावी बस इस देश के एक सिरे से दूसरे सिरे तक हज़ारों मील का सफ़र तय करेगी अगले छह हफ़्तों में, शहरों, गांवों, गिरजाघरों, स्कूलों में अमरीका की सुनने और अमरीकियों से बात करने के लिए.

विभाजित अमरीका

ये यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका बंटा हुआ है केवल अलग अलग टाइम ज़ोन में ही नहीं, लाल यानि रिपब्लिकन और ब्लू यानि डेमोक्रैट अमरीका में, काले और गोरे अमरीका में, नॉर्मल और गे अमरीका में, धर्मांध और आधुनिक अमरीका में.

हाल ही में हुए एक सर्वे में यहां के 85 प्रतिशत लोगों का मानना है कि देश ग़लत दिशा में जा रहा है.

हमारी कोशिश होगी इनसे जानने की कि सही दिशा क्या है. किधर जाता हुआ देखना चाहता है एक आम अमरीकी अपने देश को.

इसके लिए मैं सवार हो रहा हूँ कि इस बस पर एरिज़ोना में. एरिज़ोना वो राज्य है जहां से जॉन मैक्केन सीनेट में चुनकर आते हैं.

हमारी बस गुज़रेगी मैक्सिको के सीमावर्ती इलाकों से यानि वो इलाके जहां से हज़ारों लाखों लातिनी अमरीकी क़ानूनी और ग़ैर क़ानूनी तरीकों से घुसते हैं एक अमरीकन सपने के साथ या एक सपने की तलाश में.

मैं जाऊंगा न्यू मेक्सिको और टेक्सस भी, कोशिश करूंगा समझने की कि क्यों एबोर्शन या गर्भपात जो निजी फ़ैसले होते हैं, चुनावी मुद्दे बन जाते हैं, क्यों धर्म राजनीति से इतना ज़्यादा जुड़ा हुआ है और क्या ऊर्जा को लेकर अमरीकी सोच बदल रही है.

यह भी देखना है कि दुनिया जितनी रुचि ले रही है अमरीका में, यहां के चुनावों में, क्या अमरीका भी बाकी दुनिया के बारे में कोई सोच रखता है.

इस यात्रा में मेरे साथ होंगे बीबीसी के अलग अलग चैनलों के संवाददाता, टेलीविज़न, रेडियो, ऑनलाइन, कोई वियतनामीज़ सर्विस से तो कोई पर्शियन सर्विस से, कोई अमरीका को अफ़्रीका पहुंचा रहा होगा तो कोई इंडोनेशिया. यानि एक बस में पूरी दुनिया.

है न अनूठी कोशिश?