गुरुवार, 11 सितंबर, 2008 को 09:18 GMT तक के समाचार
हफ़ीज़ चाचड़
कराची से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
9/11 के बाद से दुनिया भर के विशेषज्ञों के बीच पाकिस्तान की चर्चा आतंकवाद की नई धुरी के रूप में हो रही है और जानकारों का मानना है कि आतंकवादियों को पाकिस्तान में अपनी गतिविधियों के लिए सुरक्षित ठिकाना मिल गया है.
अब अमरीका भी अंतरराष्ट्रीय सीमाएँ पार कर पाकिस्तान के भीतर आतंकवादियों पर सीधी चढ़ाई कर रहा है. इस उभरती हुई नई परिस्थिति में यह खोजने की ज़रूरत है कि आख़िर पाकिस्तान कैसे एक आतंकवाद प्रायोजक देश बन गया और सुरक्षा बलों की कार्रवाईयों के बावजूद भी चरमपंथ क्यों नहीं ख़त्म हो सका?
सात साल पहले अमरीका की विशाल इमारत वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को गिराया गया और इस की ज़िम्मेदारी अल-क़ायदा पर लगा दी गई.
अमरीका ने अल क़ायदा को नष्ट करने के लिए अफ़ग़ानिस्तान पर चढ़ाई की और उस के विमानों ने अल क़ायदा और तालेबान विद्रोहियों के ठिकानों पर हमले किए.
लड़ाई
उस समय अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान की सरकार थी और तालेबान के लड़ाकों ने भी जबावी कार्रवाई की. जिसके कारण लड़ाई भीषण शुरू हो गई.
इस बीच एक और अफ़ग़ानिस्तान में अल क़ायदा और तालेबान का प्रभाव कम हो रहा था तो दूसरी ओर पाकिस्तान में बढ़ रहा था. उस समय परवेज़ मुशर्रफ के नेतृत्व वाली पाकिस्तानी सरकार ने आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध में अमरीका का भरपूर साथ देने का फ़ैसला किया.
लेफ़्टिनेंट जनरल मोइनुद्दीन हैदर उस समय अंतरिक मामलों के मंत्री थे. उन्होंने बताया कि उनकी सरकार ने अमरीका के कहने पर क़बायली इलाक़ों में तालेबान विद्रोहियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई शुरू कर दी.
अफ़ग़ानिस्तान की सीमा से लगे क़बायली इलाक़ों में तालेबान का प्रभाव है और सरकार इन्हीं इलाक़ों में अपना नियंत्रण खो चुकी है.
वज़ीरिस्तान के शहरों में आज भी ऐसे नारे लगाए जाते हैं. इन्हीं इलाक़ों में पिछले कुछ वर्षों के दौरान पाकिस्तान सेना को बहुत नुक़सान हुआ है.
जाने माने विश्लेषक हुसैन नक़ी के अनुसार पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान में बैठे कुछ लोग अगर तालेबान का समर्थन करना बंद कर दें तो देश में चरमपंथ का सफ़ाया हो जाए.
कोशिश
पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग के महासचिव इक़बाल हैदर इस बात से सहमत हैं, उन का कहना है कि जिया-उल-हक़ के कार्यकाल में अमरीका के कहने पर इस्लामी चरमपंथ को बढ़ावा दिया गया और परवेज़ मुशर्रफ़ ने अमरीका के कहने पर उसे ख़त्म करने की कोशिश की जो नहीं हो सका.
इक़बाल हैदर का कहना है कि अगर पाकिस्तान आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध में अमरीका का सहयोगी न बनता तो शायद ऐसी स्थिति नहीं होती. स्वात घाटी और आसपास के इलाक़ों में मौलाना फ़ज़लुल्लाह के जोशीले भाषणों से तालेबान समर्थकों में इज़ाफ़ा हो रहा है, जो लोगों को जेहाद का सबक देता है.
इन इलाक़ों के लोगों में अमरीका के ख़िलाफ़ काफ़ी ग़ुस्सा पाया जाता है. पाकिस्तान में बढ़ते हुए आतंकवाद से पड़ोसी देशों पर सीधा प्रभाव पड़ रहा है.
चरमपंथ को ख़त्म करना नई सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है क्योंकि इस्लामी ताक़तें और रक्षा मामलों से जुड़े लोग महत्पूर्ण मुद्दों पर एक तरह की सोच रखते हैं. पिछले सात सालों में सबसे ज़्यादा प्रभावित हुई है यहाँ की जनता. अगर 9/11 के हमले न होते तो शायद आतंकवाद और चरमपंथ ज़्यादा न बढ़ता.