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सोमवार, 08 सितंबर, 2008 को 13:11 GMT तक के समाचार

मुकुल देवीचंद
बीबीसी रेडियो फ़ोर

9/11 के बाद इस्लाम का राजनीतिकरण

'राजनीतिक इस्लाम' का अभ्युदय पिछली शताब्दी की सबसे अहम वैचारिक घटनाओं में से एक है.

बीबीसी रेडियो फ़ोर ने इस विचार के बढ़ने और ब्रिटेन समेत दुनियाभर में इसके स्तब्ध करने वाले प्रभावों को लेकर विश्लेषण किया.

इस्लाम दुनियाभर में एक अरब से भी अधिक लोगों के लिए एक आस्था और आचार संहिता है. लेकिन कुछ लोगों के लिए यह एक 'राजनीतिक परियोजना' है.

ओसामा बिन लादेन की नज़रों में 11 सितंबर 2001 का हमला सामरिक और रणनीतिक जीत थी.

उनका मानना है कि उन्होंने सुपरपावर के अभिमान को चकनाचूर कर दिया, कथित रूप से हजारों 'काफ़िरों' को मौत के घाट उतार दिया और अमरीका को सैन्य अभियान के लिए विवश कर दिया जिसे अल-क़ायदा 'इस्लाम पर हमले' के रूप में प्रचारित कर सका.

यह हमला भले ही बहुत कम संसाधनों के बूते किया गया लेकिन राजनीतिक और धार्मिक विचारधारा को काफ़ी गति मिली. लेकिन ज्यादातर मुसलमानों की नजर में यह एक त्रासदी थी क्योंकि इससे ग़ैर-मुस्लिमों के मन में इस्लाम को लेकर प्रश्न उठने लगे.

सवाल उठता है कि इन सब घटनाक्रमों ने ब्रिटेन में इस्लाम के राजनीतिक विकास पर क्या प्रभाव डाला.

जब तक अल-क़ायदा ने इसकी ज़िम्मेदारी नहीं ली, तब तक कुछ उम्मीदें थीं कि इसके पीछे मुस्लिम नहीं हैं. पर 9/11 हमले से का संबंध इस्लाम से जोड़े जाने पर मुस्लिम समुदाय के लोगों को काफ़ी शर्मिंदा होना पड़ा.

इस घटना के सात साल बीतने के बाद भी इसे मुस्लिमों के स्वाभिमान और आक्रोश से जोड़कर देखा जाता है.

वैचारिक मेल

कुछ वर्ष पहले तक दक्षिण एशियाई मूल के ब्रिटिश मुस्लिमों को अरब की राजनीतिक इस्लामिक गतिविधियों की आम तौर पर जानकारी नहीं होती थी और 'मुस्लिम भाईचारे' जैसी कोई भावना भी नहीं थी.

लेकिन विश्व भर में बदलते घटनाक्रम ने उन्हें बदल दिया है और अब वे राजनीतिक मसलों और पश्चिम में अपनी पहचान को लेकर नियमत रूप से विचारों का आदान- प्रदान करते हैं.

मुस्लिम एसोसिएशन ऑफ़ ब्रिटेन फ़लस्तीन के मुद्दे को लेकर ज़ोरदार अभियान चला रहा है. इराक़ युद्ध के विरोध में लंदन में हज़ारों लोगों की रैली के पीछे भी यही संगठन था.

दूसरी ओर 'राजनीतिक इस्लाम' के विचार ने ब्रिटिश मुस्लिमों को चिंतित भी कर दिया है. मीडिया और राजनेता इस्लाम के राजनीतिक चेहरे के बारे में सवाल कर रहे हैं. फ़लस्तीन में आत्मघाती हमलों को लेकर उन्हें जवाब देना पड़ रहा है.

इराक़ को लेकर भी सवाल हैं. हालाँकि ज़्यादतर ब्रिटिश मुस्लिम युद्ध का विरोध करते हैं, लेकिन बहुत ऐसे भी हैं जो मानते हैं कि उनकी बातें न सुनने का ही नतीजा लंदन में पिछले वर्ष 7 जुलाई को हुए धमाके हैं.

बम धमाकों में कथित रूप में शामिल माने जाने वाले मोहम्मद सिद्दकी ख़ान के वीडियो संदेश में कहा गया था कि धमाके मध्य पूर्व को लेकर पश्चिमी देशों की नीतियों का परिणाम है.

क्या इसका यह मतलब है कि अल-क़ायदा से प्रेरित चरमपंथी संगठन का पश्चिमी देशों पर हमला टालना नामुमकिन है? कम-से-कम यूरोप के आतंकवाद विशेषज्ञ तो यही मानते हैं.

हालाँकि ब्रिटेन में कुछ मुस्लिम कार्यकर्ताओं का मानना है कि मुसलमानों के अधिक राजनीतिक आवाज़ प्रदान करना ही इस समस्या का हल है.