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सोमवार, 08 सितंबर, 2008 को 14:23 GMT तक के समाचार

रहीमुल्ला युसूफ़ज़ई
वरिष्ठ पत्रकार

बड़ी लड़ाई में नाकामी हाथ लगी

इन सात सालों में अफ़ग़ानिस्तान में काफ़ी बदलाव आए हैं. शिक्षा के स्तर पर सुधार हुए हैं. ख़ासकर महिलाओं के संदर्भ में. तालेबान ने लड़कियों की शिक्षा पर जो पाबंदी लगाई थी, वो हटा ली गई.

अब लड़कियाँ स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी में शिक्षा हासिल कर रही हैं. महिलाओं के काम करने पर भी पाबंदी थी. अब वो पाबंदी भी हट गई है.

बड़ी-बड़ी सड़कें बनी हैं. काबुल से कंधार और हेरात तक. इसके अलावा देश में रोज़गार के अवसर पैदा हुए हैं. देश में लोकतंत्र भी स्थापित हुआ है, चुनाव हुए हैं, संसद बनी है.

इन सात सालों में अफ़ग़ानिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मदद भी काफ़ी मिली है. हालात सुधरने के कारण अफ़ग़ान शरणार्थी पाकिस्तान और ईरान से वापस स्वदेश भी लौटे हैं.

लेकिन इन सकारात्मक बदलावों के बावजूद कुछ नकारात्मक चीज़ें भी हुई हैं. लड़ाई अभी भी जारी है. अल क़ायदा को थोड़ी बहुत मार तो पड़ी, नुक़सान भी हुआ लेकिन संगठन पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ है.

परेशानी

तालेबान को शिकस्त तो मिली लेकिन एक बार फिर वे उभर कर सामने आ गए हैं. देश में इंतज़ाम बेहतर नहीं हैं और लोग परेशान भी हैं. देश का कोई भी इलाक़ा या कोई भी रास्ता सुरक्षित नहीं है.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो वादे अफ़ग़ानिस्तान के साथ किए गए थे, वे पूरे नहीं हुए. हामिद करज़ई की सरकार में जनता का भरोसा भी कम हुआ है. जनता ने सात साल पहले जो उम्मीदें लगाई थी, वो काफ़ी हद तक पूरी नहीं हुई हैं.

जहाँ तक अंतरराष्ट्रीय स्तर की बात है, जिस लक्ष्य को लेकर लड़ाई शुरू हुई थी, वो पूरी नहीं हुई है. तालेबान के जाने के बाद नई सरकार उतनी मज़बूत नहीं है.

चरमपंथियों की संख्या लगातार बढ़ी है. अफ़ग़ानिस्तान में यह सोचकर कार्रवाई हुई थी कि सारी दुनिया में अमन क़ायम होगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अमरीका की तो स्थिति और ख़राब हुई है.

क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान में भी उनके विरोधी ज़्यादा सक्रिय हुए हैं. अमरीकी सैनिकों पर भी हमले बढ़े हैं. शुरू में ऐसी स्थिति नहीं थी क्योंकि आम जनता तालेबान का समर्थन नहीं करती थी.

बदलाव

शुरू में अमरीकी सैनिकों का वहाँ स्वागत हुआ था. लेकिन इन सात सालों के दौरान स्थितियाँ काफ़ी कुछ बदल गई हैं. अब तो ज़्यादातर लोग यही चाहते हैं कि विदेशी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान में न रहे.

क्योंकि कई बार उनकी कार्रवाई से निर्दोष लोग मारे गए हैं. पिछले कुछ वर्षों के दौरान अंतरराष्ट्रीय सैनिकों की संख्या अच्छी ख़ासी बढ़ी है. लेकिन जनता को इसका क्या फ़ायदा मिला है. शांति नहीं स्थापित हो पा रही है.

अमरीकी जिस मक़सद से अफ़ग़ानिस्तान में आए थे, वह था कि वे ओसामा बिन लादेन को पकड़ेंगे या उन्हें मार देंगे. मुल्ला उमर को पकड़ना है, लेकिन इसमें कामयाबी नहीं हासिल हुई.

एक और चुनौती अफ़ीम उत्पादन के मोर्चे पर है. दुनिया की 93 फ़ीसदी अफ़ीम अभी भी यहीं पैदा होती है. इस पर काबू नहीं पाया गया है.

(पंकज प्रियदर्शी से बातचीत पर आधारित)