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सोमवार, 23 जून, 2008 को 23:48 GMT तक के समाचार

ग्वांतानामो के बंदी को अदालत से राहत

एक अमरीकी अदालत ने पहली बार ग्वांतानामो बे के बंदी शिविर में क़ैद एक व्यक्ति को 'शत्रु सैनिक' मानने से इनकार कर दिया है.

चीनी मुसलमान हुज़ैफ़ा फ़रहत को 2001 में अफ़ग़ानिस्तान में बंदी बनाया गया था और वे तब से ग्वांतानामो बंदी शिविर में बंद हैं.

इस फ़ैसले के दूरगामी प्रभाव होंगे क्योंकि अब फ़रहत अमरीकी अदालत में अपनी रिहाई की अपील कर सकते हैं.

इससे पहले अमरीकी सुप्रीम कोर्ट ने इसी महीने फ़ैसला सुनाया था कि ग्वांतानामो बंदी शिविर में बंद क़ैदी अमरीकी सिविल अदालतों में अपनी क़ैद को चुनौती दे सकते हैं.

फरहत चीन के ज़िन जियांग प्रांत के रहने वाले हैं जो मध्य एशिया की सीमा से लगा हुआ है.

अमरीकी सरकार का कहना है कि फ़रहत तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट नाम के आतंकवादी संगठन के सदस्य थे जिसके संबंध अल क़ायदा से थे.

फरहत के वकीलों ने दलील दी थी कि वे चीन की सरकार के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे न कि अमरीका के, इसलिए उन्हें अमरीका का 'शत्रु सैनिक' कहा जाना ग़लत है.

ज़िन ज़ियांग प्रांत के मुसलमान चीन से स्वायत्तता की माँग कर रहे हैं और वहाँ अक्सर विद्रोही हिंसा की घटनाएँ होती रहती हैं.

फ़ैसला

तीन जजों की बेंच ने अमरीकी सेना को निर्देश दिया है कि वह या तो फरहत को रिहा करे या फिर उनके मामले की फ़ौरन सुनवाई करे, उन्हें बिना सुनवाई के ग्वांतानामो बे में कैद नहीं रखा जा सकता.

अपने फ़ैसले में जजों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के 12 जून के फैसले के अनुरूप फ़रहत चाहें तो फ़ेडरल जज की अदालत में तुरंत रिहाई की अपील कर सकते हैं.

ग्वांतानामो बे बंदी शिविर में फ़रहत के अलावा ज़िन जियांग प्रांत के कई और मुसलमान बंद हैं.

इन चीनी नागरिकों का मामला अमरीका के लिए एक कूटनीतिक सिरदर्द बना हुआ है, अदालत के ताज़ा फ़ैसले से अमरीकी सेना की मुश्किलें बढ़ जाएँगी क्योंकि रिहा होने के बाद फ़रहत को चीन की सरकार स्वीकार करेगी या नहीं, यह भी एक बड़ा मसला होगा.