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शनिवार, 17 मई, 2008 को 10:53 GMT तक के समाचार

ब्रजेश उपाध्याय
बीबीसी संवाददाता

'ठिकाने तक नहीं पहुँच पाती अमरीकी सहायता'

अमरीकी सांसदों का कहना है कि पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान को दी जाने वाली अरबों डॉलर की सहायता का अधिकांश हिस्सा दरअसल वहाँ तक पहुँच ही नहीं पाता.

पूर्व राजदूतों रिचर्ड हॉलब्रूक और थॉमस पिकरिंग का कहना है कि सहायता राशि का अधिकांश हिस्सा सलाहकार शुल्क और दूसरी मदों में ख़र्च हो जाती है और अमरीका में ही रह जाती है.

संसदों ने जानना चाहा है कि निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचने से पहले कितनी राशि अमरीका में ही ख़र्च हो जाती है.

अमरीकी सहायता एजेंसी के अधिकारी का कहना है कि अतिरिक्त ख़र्चे कुल सहायता राशि के 30 फ़ीसदी से अधिक नहीं होते.

गंभीर प्रयास

अधिकारी ने कहा है कि इन अतिरिक्त ख़र्चों को कम करने के गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं और परियोजनाओं में स्थानीय लोगों को शामिल करने पर ज़ोर दिया जा रहा है.

विदेशी मामलों की संसदीय समिति के वरिष्ठ सदस्य गैरी अकरमैन कहते हैं, "हैरानी की बात है कि अब जाकर हमें अहसास हुआ है कि अरबों डॉलर की सहायता राशि वहीं ख़र्च होनी चाहिए जहाँ के लिए इसे दिया जा रहा है."

अकरमैन ने इसकी तुलना होमलैंड सिक्योरिटी मामले से की, जिसमें हवाई अड्डे पर स्क्रीनर्स लगाने का ठेका हासिल करने के बाद कंपनी ने 20 फ़ीसदी राशि काटते हुए ठेका दूसरी कंपनी को दे दिया और ऐसा एक-दो बार नहीं, बल्कि तीन बार हुआ.

इस तरह जो लोग वाकई इस काम में लगे हुए थे उन्हें ठेके की कुल रकम का 40 फ़ीसदी ही हासिल हुआ.

मुश्किलें

अधिकारी ने कहा कि हालाँकि यह मामला पूरी तरह वैसा नहीं है, लेकिन इसमें कुछ व्यवहारिक मुश्किलें और स्थानीय विशेषज्ञता की कमी है.

अंतर्राष्ट्रीय विकास के लिए काम करने वाली अमरीकी एजेंसी के मार्क वार्ड ने कहा, "अगर हम 10 करोड़ डॉलर की निर्माण परियोजना के लिए बोली मंगाएं तो अफ़ग़ानिस्तान में कोई कंपनी नहीं है जो इसके लिए आगे आए और पाकिस्तान में कुछेक होंगी."

लेकिन अमरीकी सहायता एजेसिंयों के बारे में आम शिकायत ये है कि जो रकम किसी देश में विद्यालय की इमारत बनाने या अध्यापकों को प्रशिक्षित करने के लिए ख़र्च की जा सकती है, उसे वहाँ न ख़र्च कर दूसरी मदों मसलन यूरोप और अमरीका में एजेंसी के दफ़्तरों पर ख़र्च किया जाता है.

विदेश विभाग के पूर्व विश्लेषक मार्विन वेनबॉम का कहना है कि अमरीकी सहायता एजेंसियों की लंबे समय से आलोचना हो रही है लेकिन इसका समाधान आसान नहीं है.

वो कहते हैं, "यह व्यवस्था से जुड़ी समस्या है. सहायता एजेंसियों को कुछ नियम क़ानूनों के तहत काम करना होता है और उनके पास लचीला रुख़ अपनाने की ज़्यादा गुंजाइश नहीं होती."

कुछ प्रशासकों का मानना है कि इस समस्या का समाधान ये है कि बड़े ठेकों की बजाय छोटे ठेकों को प्राथमिकता दी जाए.

एक अन्य अधिकारी मार्क वार्ड कहते हैं, "अगर हमारे पास अधिक अधिकारी हों जो छोटे-छोटे ठेकों पर नज़र रखें तो अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान की कई कंपनियां बोली की प्रक्रिया में शामिल हो सकेंगी."