शनिवार, 10 मई, 2008 को 03:00 GMT तक के समाचार
बर्मा में नए संविधान के लिए शनिवार को जनमत संग्रह संपन्न हो गया. है. संयुक्त राष्ट्र ने तूफ़ान से हुई तबाही के मद्देनज़र इसे स्थगित करने की अपील की थी.
विपक्षी के कई लोगों ने जनमत संग्रह की आलोचना की है और कहा है कि ये बर्मा में सैन्य शासन बनाए रखने की एक कोशिश है.
कई लोगों का कहना है कि मतदान केंद्रों में सैनिक मौजूद थे और उन्हें मजबूरी में 'हाँ 'पर वोट डालना पड़ा.
जनमतसंग्रह बर्मा के उस दो-तिहाई हिस्से में हुआ जो तूफ़ान नर्गिस से प्रभावित नहीं है .
तूफ़ान नर्गिस से बुरी तरह प्रभावित रंगून और कुछ अन्य इलाक़ों में मतदान दो हफ़्ते के लिए टाल दिया गया है.
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि बर्मा में राहत सामग्री लेकर दल पहुंच गया है लेकिन सैन्य शासन ने विदेशी राहतकर्मियों को बर्मा में काम करने की अनुमति नहीं दी है.
इससे पहले संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने चेतावनी दी थी कि अगर बर्मा ने विदेशी सहायताकर्मियों को राहत और बचाव के लिए जाने नहीं दिया तो इसके गंभीर परिणाम होंगे.
उन्होंने कहा कि बर्मा में हज़ारों लोगों की जान ख़तरे में है और उन तक सहायता पहुँचाना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए.
हालाँकि संयुक्त राष्ट्र की सहायता एजेंसी के प्रमुख जॉन होम्स ने बीबीसी से बातचीत में उम्मीद जताई कि जनमत संग्रह के बाद बर्मी सरकार के रुख़ में लचीलापन आएगा.
बीबीसी के संवाददाता एंड्र्यू हार्डिंग का कहना है कि जनमत संग्रह एक बड़ा जुआ है और एक संभावना है कि तूफ़ान पीड़ितों की स्थिति देखकर नाराज़ जनता शायद अपना वोट सरकार के ख़िलाफ़ डाल दें.
सहायता को लेकर चिंता
उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र ने बर्मा के लिए 20 करोड़ डॉलर की सहायता अपील जारी की है.
और इसके बाद संयुक्त राष्ट्र में बर्मा के दूत क्याव टिंट श्वे ने कहा है कि उनका देश हर सहायता को स्वीकार करने के लिए तैयार है.
संयुक्त राष्ट्र की संस्था विश्व खाद्य कार्यक्रम ने कहा है कि सहायता सामग्री की पहली खेप को बर्मा पहुँचने पर वहाँ की सरकार ने ज़ब्त कर लिया है.
इस बीच अमरीका ने कहा है कि बर्मा सरकार ने एक विमान भर सहायता सामग्री भेजने की स्वीकृति दे दी है.
उल्लेखनीय है कि पिछले शनिवार को आए भीषण तूफ़ान में बर्मा में क़रीब 23 हज़ार लोग मारे गए थे. हालांकि अमरीका का अनुमान है कि मरने वालों की संख्या एक लाख के क़रीब हो सकती है.
बर्मा के सैन्य शासक जिस तरह से इस आपदा से निपटने की कोशिश कर रहे हैं उसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा की जा रही है.
वे अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसियों को देश के भीतर नहीं जाने देना चाहते और ज़ोर दे रहे हैं कि सारी सहायता वे ख़ुद ही पहुँचा देंगे.