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शुक्रवार, 25 अप्रैल, 2008 को 22:45 GMT तक के समाचार

'हिंसा में उपयोग हो रहा है बच्चों का'

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि इराक़ में विद्रोही गुट और लड़ाके हिंसक वारदातों को अंजाम देने के लिए बच्चों का उपयोग कर रहे हैं.

संस्था की एक अधिकारी का कहना है कि 2004 के बाद से हिंसक वारदातों के लिए बच्चों का उपयोग बढ़ा है और उनका उपयोग आत्मघाती हमलों तक में किया जा रहा है.

ऐसा लगता है कि इराक़ के संघर्ष में बच्चों पर जो असर हो रहा है वह सबसे क्रूर है.

संयुक्त राष्ट्र में बच्चों और हिंसक संघर्ष के मामलों की प्रतिनिधि राधिका कुमारस्वामी का कहना है कि इराक़ के हाल के दौरे के बाद उन्हें लगता है कि वहाँ हिंसा बच्चों को दबे पाँव अपना शिकार बना रही है.

बीबीसी से हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि इराक़ में बच्चों की स्थिति बर्दाश्त करने लायक नहीं है.

उन्होंने कहा, “जो क़िस्से-कहानियों के ज़रिए सुना और जो कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया उसके आधार पर हमारे पास सबूत हैं कि 2004 के बाद से लड़ाके और विद्रोही गुटों के लोग बच्चों से काम ले रहे हैं. और उनमें से कुछ को काम के लिए पैसे भी दिए जाते हैं.”

उनका कहना है, “उनसे मुख्य रुप से मार्टार हमलों और बम रखने का काम लिया जाता है.”

राधिका कुमारस्वामी का कहना है कि परिवारों के जातीय हिंसा में फँस जाने के बाद बच्चें अपने भाई या परिवार के दूसरे सदस्यों की नकल करते हुए यह काम करने लगते हैं.

उनका कहना है कि जिन बच्चों से काम लिया जाता है उममें से कुछ की उम्र तो दस साल भी होती है.

राधिका कुमारस्वामी का कहना है कि सैकड़ों बच्चों को बंधक बनाकर भी रखा गया है.

इराक़ में आधे बच्चे ही स्कूल जा पाते हैं और जैसा कि संयुक्त राष्ट्र की प्रतिनिधि ने बताया कि बहुत से बच्चों को मूलभूत सुविधाएँ भी नहीं मिल पा रही हैं.

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब इराक़ में बच्चों को लेकर चिंता जताई जा रही है.

पिछले ही महीने अमरीकी सेना ने एक वीडियो जारी किया था जिसमें दिखाया गया था कि किस तरह बच्चों को बंदूक चलाने, अपहरण करने और दूसरी अन्य गतिविधियों की ट्रेनिंग दी जा रही है.