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बुधवार, 23 अप्रैल, 2008 को 15:59 GMT तक के समाचार

ब्रजेश उपाध्याय
बीबीसी संवाददाता, अमरीका

व्हाइट हाउस तक की कठिन डगर

वाशिंगटन में जिस सड़क पर राष्ट्रपति निवास है उसे पेंसिलवेनिया एवेन्यू कहते हैं और इसलिए अमरीकी राजनीति में एक कहावत है कि व्हाइट हाउस का रास्ता पेंसिलवेनिया से होकर गुज़रता है.

हिलेरी क्लिंटन ने पेंसिलवेनिया में जीत तो हासिल कर ली लेकिन पार्टी की उम्मीदवारी अभी भी उनसे ज़्यादा बराक ओबामा के हाथों में ही जाती दिख रही है.

लेकिन इस जीत ने उन लोगों के मुँह ज़रूर बंद कर दिए हैं जो हिलेरी क्लिंटन पर मैदान छोड़ने के लिए दबाव डाल रहे थे.

दस प्वाइंट से मिली इस ज़बरदस्त जीत के बाद हिलेरी ने भी तुरंत एलान कर दिया कि उनका इरादा पीछ हटने का नहीं है.

इस हार से बराक ओबामा के माथे पर सिलवटें तो ज़रूर आईं है लेकिन उन्हें भी ये मालूम है कि बचे हुए नौ राज्यों में फ़ैसला जो भी हो कुल प्रतिनिधियों की संख्या उनके पास ही ज़्यादा रहेगी.

उन्होंने अमरीकी राजनीति में बदलाव की ज़रूरत के संदेश को दोहराना जारी रखा है.

सवाल उठता है कि जब आखिरी पड़ाव पर भी उनके पास प्रतिनिधियों की संख्या ज़्यादा होगी तो फिर ये रेस जारी क्यों है?

कांटे का मुक़ाबला

क्योंकि केवल आगे होने से कुछ नहीं होता दोनों उम्मीदवारों में से एक को 2025 प्रतिनिधियों का समर्थन हासिल करना होगा और ये लगभग तय है कि दोनों ही ये हासिल नहीं कर पाएँगे क्योंकि मुक़ाबला बिल्कुल कांटे का रहा है.

आख़िरी फ़ैसला करना होगा पार्टी के उन वरिष्ठ सदस्यों और सेनेटर्स को जिन्हें सुपरडेलिगेट्स कहा जाता है और उनकी संख्या है आठ सौ. इनके वोट जिधर ज्यादा जाएंगे जीत उसकी होगी.

पिछले कुछ समय से दोनों ही उम्मीदवार अब इन्हीं सुपरडेलिगेट्स को रिझाने में लगे हुए हैं.

हिलेरी क्लिंटन का दावा है कि वो भले ही पीछे चल रही हों लेकिन बड़े राज्यों में, जो नवंबर के चुनाव में मायने रखते हैं, वहां उन्होंने जीत हासिल की है और उन्हीं के पास ताक़त है जॉन मैकेन को हराने की.

ओबामा कहते हैं कि इन राज्यों में वो भले ही हिलेरी से हारे हों लेकिन रिपब्लिकंस के ख़िलाफ़ जीतने में मुश्किल नहीं होगी क्योंकि वहां पूरी पार्टी उनके साथ होगी.

लेकिन क्या सचमुच इस लंबी लड़ाई के बाद पार्टी एकजुट रह पाएगी.

यही सवाल पार्टी में कई लोगों को परेशान कर रहा है और चेयरमैन हावर्ड डीन ने कहा है कि सुपरडेलीगेट्स एक जुलाई तक अपना फ़ैसला ज़रूर दे दें.

कम से कम तीन सौ सुपर डेलीगेट्स हैं जिन्होंने अपना मन नहीं बनाया है. उनका कहना है कि जहां ओबामा ने एक लहर पैदा की है, वहीं हिलेरी ने जीत हासिल करने का एक जूझारूपन दिखाया है और यह रिपब्लिकन मशीनरी को हराने के लिए अहम है.

एक और जद्दोजहद ये है कि अगर ओबामा उम्मीदवार बनते हैं तो क्या गोरे वोटरों का उन्हें साथ मिलेगा. डर इस बात की भी है कि अगर हिलेरी उम्मीदवार बनती हैं तो कहीं काले वोटर मायूस होकर घर में ही बैठे तो नहीं रह जाएंगे.

लेकिन इन सबके बावजूद सुपरडेलिगेट्स पर दबाव बढ़ रहा है कि वो जल्द ही अपना मन बनाएं नहीं तो इस नाप तौल में नुकसान इतना हो जाएगा कि हाथ मलने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा.