ब्रजेश उपाध्याय
बीबीसी संवाददाता, वाशिंगटन
अमरीका में राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी की दौड़ जैसे जैसे लंबी खिचती जा रही है, उम्मीदवारों के खर्च भी बढ़ रहे हैं और पैसा इकट्ठा करने के लिए नए नए तरीक़े इस्तेमाल किए जा रहे हैं.
कल एक चिठ्ठी आई मेरे नाम की और लिखा हुआ था...डियर ब्रजेश, मैं, तुम, न्यूय़ॉर्क की शाम, और एल्टन जॉन का म्यूज़िक...आआगे न?
आगे था तुमने अभी तक इतना कुछ किया है मेरे लिए. कई बार दिल चाहता है आमने सामने बैठकर बातें करें और नौ अप्रैल को ये मौक़ा है.
भेजने वाली थीं हिलेरी क्लिंटन...जी हां राष्ट्रपति पद के टिकट की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन.
पहले मैंने सोचा मैने ऐसा क्या किया है कि मुझे दावत दे रही हैं, फिर सोचने लगा शर्ट कौन सी पहनूंगा, आफ़्टर शेव की शीशी खाली हो रखी है नई लेनी होगी, तभी नज़र गई काले काले मोटे मोटे अक्षरों में लिखे हुए ''मेक योर कॉंट्रीब्यूशन टुडे...सपोर्ट हिलेरी फ़ॉर प्रेसीडेंट'' .
यानि इमेल के ज़रिए कैंपेनिंग के लिए पैसे जमा करने की एक और कोशिश.
कभी बिल क्लिंटन की ओर से पाँच डॉलर, जी हां केवल पाँच डॉलर की फ़रमाइश आती है तो कभी उनकी बेटी चेल्सी क्लिंटन कहती हैं कि मेरी मां की मदद करो.
और सारा कुछ इतने प्यार मुहब्बत से लिखा हुआ होता है कि यकीन मानिए आप भी भावुक हो जाएंगे.
वैसे असर क्या होता है उसका अंदाज़ा आपको इसी से लग जाएगा कि हिलेरी साहिबा ने एक हफ़्ते में ही एक करोड़ डॉलर इकठ्ठा कर लिया, हज़ारों लाखों वोटरों को इसी तरह की चिट्ठियाँ लिख कर.
नए तरीक़े
और उनसे कई हाथ आगे चल रहे हैं बराक ओबामा.
ऑफ़िस में मेरे पड़ोस में बैठते हैं मोहम्मद ताबर, ईरान के रहनेवाले हैं. एक दिन खोए खोए से नज़र आ रहे थे और अपने मोबाइल फ़ोन को घूर रहे थे.
मैने पूछा माजरा क्या है मियाँ. कहने लगे मिशेल ओबामा ने फ़ोन किया था, मिशेल ओबामा यानि बराक ओबामा की पत्नी.
मेरे कान खड़े हुए...पूछा क्या कह रही थीं. कहने लगे शुक्रिया अदा कर रही थीं कि मैने उनकी इतनी मदद की है और साथ में पैसे भी मांग रही थीं.
पूछा कि तुमने क्या कहा. जवाब मिला कुछ कहने का मौक़ा कहां मिला...रेकॉर्डेड आवाज़ थी.
यानि इंटरनेट और फ़ोन दोनों ही का इस्तेमाल हो रहा है पैसा जमा करने के लिए. ओबामा ने मार्च महीने में चार करोड़ डॉलर जमा किए हैं और उन्हें पैसा देनेवालों में भारी तादाद नौजवानों की है.
कैलिफ़ोर्निया की एक यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर राजन आनंद एक डेमोक्रेट हैं और पैसे इकट्ठे करने की इस कवायद से अच्छी तरह वाकिफ़ हैं.
वो इंटरनेट के जादू के बारे में कहते हैं,'' नौजवान सबसे ज़्यादा इंटरनेट से चिपके रहते हैं और जब इस तरह की खtबसूरती से लिखी चिठ्ठियां आती हैं तो बस भावुक होकर वो क्रेडिट कार्ड से बीस, पच्चीस, पचास डॉलर भेज देते हैं और बाद में जब बिल आता है तो सर पकड़ते हैं.''
लेकिन मोटी रकम तब इकट्ठी होती है जब उम्मीदवार अपने किसी हिमायती के घर में या फिर किसी और तरह का समारोह करते हैं.
राजन आनंद कहते हैं कि वहां पैसा जुटाने का एक अलग ही तरीक़ा होता है.
वो बताते हैं, '' वहाँ हर चीज़ का रेट होता है...अगर आप खाना खाएंगे तो उसका अलग रेट, अगर केवल मीठा खाएंगे वो कुछ सस्ता होगा, अगर उम्मीदवार के साथ तस्वीर भी खिंचवानी है तो वो महँगा होता है और केवल भाषण सुनेंगे तो फिर थोड़े सस्ते में निपट सकते हैं.''
तो क्या जो लोग पैसा देते हैं उन्हें भी कुछ उम्मीद रहती है कि कल अगर ये उम्मीदवार जीत गया तो कुछ काम आएगा?
राजन आनंद कहते हैं कि सीधे तौर पर तो नहीं लेकिन उम्मीदवार के जिस हिमायती के कहने पर लोग आते हैं, उससे ज़रूर कुछ उम्मीदें रखते हैं.
इस तरह के समारोहों में थोड़ा खर्च भी होता है मगर इंटरनेट की ख़ासियत ये है कि हींग लगे न फिटकिरी रंग भी चोखा आए. यानि खर्च कुछ भी नहीं और पैसे की बरसात.
वहीं एक बात और ग़ौर करने लायक है. ज़रा सोचिए कि भारत में राजनेता आम आदमी को चिट्ठी लिखें और कहें कि पैसे दे दो चुनाव लड़ना है. तो लोग समझेंगे नेताजी ने पैसे बनाने का नया तरीक़ा खोजा है.
यहाँ तो लोग फिर भी यकीन कर लेते हैं अपने नेताओं पर.
ख़ैर जो भी, मेरा न्यूयॉर्क जाने का प्रोग्राम कैंसिल हो गया. आफ़्टर शेव की शीशी भी नहीं ख़रीदी और लगा हुआ हूँ आपकी सेवा में.