शनिवार, 09 फ़रवरी, 2008 को 12:36 GMT तक के समाचार
तुर्की की संसद ने ऐसे दो प्राथमिक संवैधानिक संशोधनों को मंज़ूरी दे दी है जिसमें महिलाओं को विश्वविद्यालयों में सिर पर दुपट्टा रखने या हिजाब पहनने की इजाज़त मिलने का रास्ता साफ़ होगा.
तुर्की के विश्वविद्यालयों में मौजूदा क़ानूनी व्यवस्था के अनुसार विश्वविद्यालयों में महिलाओं के सिर पर दुपट्टा रखने या हिजाब पहनने पर पाबंदी है और इन संवैधानिक संशोधनों के ज़रिए इस पाबंदी को नरम किए जाने की व्यवस्था की जा रही है.
तुर्की की सरकार का कहना है कि हिजाब या दुपट्टा पहनने पर लगी पाबंदीकी वजह से ऐसी हज़ारों लड़कियाँ उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय नहीं जातीं जो हिजाब पहनना या सिर पर दुपट्टा रखना पसंद करती हैं.
तुर्की की संसद ने उच्च शिक्षा संस्थानों में महिलाओं के हिजाब पहनने या सिर पर दुपट्टा रखने पर लगी पाबंदी को हटाने के लिए पहले संवैधानिक संशोधन को 107 के मुक़ाबले 403 मतों से मंज़ूरी दी है.
सरकार के इस क़दम को व्यापक तौर पर समर्थन मिल रहा है, हालाँकि कुछ हज़ार लोग ऐसे भी हैं जो इसका विरोध कर रहे हैं और विरोधियों ने राजधानी अंकारा में प्रदर्शन भी किया है.
विश्वविद्यालयों में सिर पर दुपट्टा रखने या हिजाब पहनने पर लगी पाबंदी हटाने का विरोध करने वालों का कहना है कि हिजाब या सिर पर दुपट्टा रखना राजनीतिक इस्लाम का प्रतीक है इससे तुर्की गणराज्य की धर्मनिर्पेक्ष प्रकृति को ख़तरा पैदा होता है.
विपक्षी राजनीतिक दलों ने कहा है कि वे इन संवैधानिक संशोधनों को अदालत में चुनौती देंगे. अनेक सैनिक अधिकारियों और शिक्षाविदों का कहना है कि ये संशोधन सार्वजनिक जीवन में इस्लाम की मौजूदगी बढ़ाने की दिशा में पहला क़दम है.
तुर्की में विश्व विद्यालयों में महिलाओं के सिर पर दुपट्टा रखने या हिजाब पहनने पर पाबंदी लगा दी गई थी. उस समय धर्मनिर्पेक्ष कही जाने वाली सेना पर एक ऐसी तथाकथित सरकार को हटाने का दबाव बढ़ा था जिसे धुर इस्लामी कहा जाता था.
अब जो संवैधानिक संशोधन किए जा रहे हैं उनमें कहा गया है कि विश्वविद्यालयों में महिलाएँ सिर्फ़ परंपरागत हिजाब पहन सकती हैं जिन्हें सिर पर ओढ़ते हुए ठोड़ी के नीचे तक बांधा जाता है, गर्दन तक ढकने वाले हिजाब, चादर और बुर्का पहनने पर अब भी पाबंदी लगी रहेगी.
समर्थन और विरोध
राजधानी अंकारा में मिडिल ईस्ट टेक्नीकल यूनिवर्सिटी के रेक्टर उरल अकबुलूत का कहना है कि इन संवैधानिक संशोधन से नज़र आता है कि धार्मिक आस्थाएँ संविधान में थोपी जा रही हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "हमारा कहना है कि इससे धर्मनिर्पेक्षता का नुक़सान होगा. एक बार यह हो जाता है तो हमारा मानना है कि इससे लोकतंत्र का भी नुक़सान होगा."
बीबीसी संवाददाता सारा रेन्सफ़ॉर्ड का कहना है कि जो महिलाएँ सिर पर दुपट्टा रखती हैं या हिजाब पहनती हैं, वे इस विरोध को सिर्फ़ बेकार की हायतौबा बताकर ख़ारिज करती हैं. ऐसी महिलाओं का कहना है कि सिर पर दुपट्टा रखना सिर्फ़ निजी धार्मिक आस्थाओं की अभिव्यक्ति है.
तुर्की की ज़्यादातर आबादी मुस्लिम है और कुल आबादी में से क़रीब दो-तिहाई महिलाएँ सिर पर दुपट्टा रखती हैं या हिजाब पहनती हैं. इसका मतलब है कि ऐसी हज़ारों महिलाएँ विश्वविद्यालय जाने और उच्च शिक्षा से वंचित थीं जो सिर पर दुपट्टा रखना या हिजाब पहनना पसंद करती हैं.
बहुत से तुर्की लोग तर्क देते हैं कि विश्वविद्यालयों में महिलाओं को सिर पर दुपट्टा रखने या हिजाब पहनने पर पाबंदी न्यायसंगत नहीं है और अब जो सरकार पाबंदी हटाने का प्रस्ताव कर रही है, उसे व्यापक समर्थन मिल रहा है.
लेकिन लाखों लोग ऐसे भी हैं जो पाबंदी हटाने के क़दम का विरोध कर रहे हैं और संभावना है कि उनका विरोध प्रदर्शन व्यापक पैमाने पर होगा.