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बुधवार, 30 जनवरी, 2008 को 10:49 GMT तक के समाचार

एंड्रयू हार्डिंग
बीबीसी न्यूज़, मे हांग सन

थाईलैंड में महिलाओं का 'आदमीखाना'

ऐसा हो नहीं सकता कि इन औरतों को देखकर आपकी नज़रें न ठहरें.

थाईलैंड के घने जंगलों में गंदे-मटमैले रास्ते पर सफ़र के अंत में मिली ये महिलाएँ छाँव में बैठकर अपनी जिराफ़ जैसी लंबी गर्दन में पीतल के छल्ले पहनती दिखीं.

गले की असामान्य लंबाई की स्वामी इन महिलाओं को देखने के लिए दूर-दूर से पर्यटक आते हैं. इनमें से एक महिला की तस्वीरें उतार रहे कनाडा के एक पर्टयक इसे "अतुलनीय" कहते हैं.

बाँस की बनी झोंपड़ी में रहने वाली यह औरत उस पर्यटक को कुछ चीज़ें बेचने की भी कोशिश करती है. बर्मा के रहने वाले कयान समुदाय के लोग थाईलैंड के इस इलाके में शरणार्थी हैं.

वर्षों से थाईलैंड के सुदूर पश्चिमोत्तर इलाके में बर्मा की सीमा से लगे "लंबे गले" वाले कयान समुदाय की आबादी वाले तीन गाँव पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र रही हैं.

लंबे गले वाली औरतों को देखने के लिए यहाँ पहुँचने वाले पर्यटक कयान महिलाओं और उनके परिवार के लिए आय का बेहतर ज़रिया हैं.

पर्यटन का बहिष्कार?

कयान लोगों के आश्रय को "आदमी का चिड़ियाखाना" बना देने के आरोपों के मद्देनज़र संयुक्त राष्ट्र अब वहाँ पर्यटन के बहिष्कार की बातें कर रहा है.

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (यूएनएचसीआर) का कहना है कि पिछले दो सालों से थाईलैंड के अधिकारी 20 कयान लोगों को फिनलैंड या न्यूज़ीलैंड में बसाने की उसकी पेशकश को ठुकरा रहे हैं.

एजेंसी को आशंका है कि स्थानीय पर्यटन उद्योग में केंद्रीय भूमिका के कारण इन महिलाओं को थाईलैंड से बाहर नहीं जाने दिया जा रहा है.

यूएनएचसीआर की क्षेत्रीय प्रवक्ता किट्टी मैकिंसे सवाल उठाती हैं, "हम समझ नहीं पा रहे हैं कि क्यों इन 20 लोगों को नई ज़िंदगी शुरू करने की इजाज़त नहीं दी जा रही."

वह बताती हैं कि बर्मा के करीब 20 हज़ार शरणार्थियों को तीसरे देश जाने की अनुमति दी गई है लेकिन कयान लोगों को रोका जा रहा है.

उनका कहना है कि थाईलैंड के अधिकारी इन लोगों के साथ अलग तरह से पेश आ रहे हैं.

मैकिन्से कहती हैं, "यह पूरी तरह से आदमी का चिड़ियाखाना है. इसका समाधान यह है कि यहाँ पर्यटकों को आने से रोका जाए."

बेहतर सौदा

थाईलैंड में शरण लेकर रह रही 23 वर्षीय कयान महिला ज़ेंबर ने पाँच साल की उम्र में ही गले में पारंपरिक छल्ला पहन लिया था.

पूर्वी बर्मा से ये लोग 18 साल पहले अपने परिवार के साथ भागकर थाईलैंड आ गए थे.

उस वक़्त बर्मा की सेना इन लोगों को ज़बरन मज़दूरी के लिए पकड़-पकड़ कर ले जा रही थी लेकिन बर्मा से आए हज़ारों लोगों में शामिल कयान समुदाय के लोगों को बाक़ी लोगों से अलग रखा गया क्योंकि इनके लंबे गले उन्हें दूसरों से जुदा बनाते थे.

ज़ेंबर की माँ मु पाओ कहती हैं, "कम से कम हम यहाँ सुरक्षित हैं और कुछ कमा सकते हैं."

कयान आबादी वाले इन गाँवों में आने के लिए प्रत्येक पर्यटक से आठ अमरीकी डॉलर वसूला जाता है.

बर्मा लौटने की धूमिल उम्मीद के साथ यहां की दूसरी बुज़ुर्ग महिलाओं के लिए हर महीने 48 अमरीकी डॉलर की आय स्वीकार्य सौदा है लेकिन 2005 में यूएनएचसीआर ने इनके सामने तीसरे देश में स्थायी रूप से बसाने की पेशकश रखी.

कई कयान परिवारों ने इस प्रस्ताव के तहत अर्ज़ी दी. ज़ेंबर और उसके परिवार को थोड़े ही दिन बाद बता दिया गया कि उनका आवेदन मंज़ूर कर लिया गया है.

ज़ेंबर कहती हैं, "मैं बहुत ख़ुश थी. उनलोगों ने बताया कि न्यूज़ीलैंड में एक नया घर हमारा इंतज़ार कर रहा है."

लेकिन पिछले दो सालों से थाईलैंड के अधिकारी ज़ेंबर और दूसरे 19 लोगों के देश छोड़ने के लिए ज़रूरी कागज़ात पर दस्तख़त ही नहीं कर रहे हैं.

शरणार्थी हैं या नहीं...

कयानों का इलाका जिस जिले में आता है, वहाँ के उप जिलाधिकारी वछीरा चोटीरोज़ेरानी कहते हैं कि वे चूँकि शरणार्थी शिविरों में नहीं रहते हैं इसलिए वे शरणार्थी नहीं हैं.

थाईलैंड के अधिकारियों का कहना है कि कयान लोग आर्थिक प्रवासी हैं जो पर्यटन से अच्छा-ख़ासा कमा रहे हैं और उन्होंने शरणार्थी शिविरों के बाहर रहना चुना है, जबकि यूएनसीएचआर का कहना है कि ये लोग पूरी तरह से शरणार्थी हैं.

एजेंसी की प्रवक्ता मैकेन्सी कहती हैं, "यह आश्चर्यज़नक है कि थाईलैंड के अधिकारी शरणार्थी शिविरों से बाहर रहने के लिए उनकी आलोचना कर रहे हैं जबकि वहाँ के अधिकारी ही ऐसा चाहते थे."

न्यूज़ीलैंड जाने देने में थाईलैंड की आपत्तियों के विरोध में ज़ेंबर ने अपने गले से वह छल्ला ही निकाल फेंका है जिसे देखने के लिए पर्यटक यहाँ आते हैं.

वे कहती हैं, "इस छल्ले के कारण मैंने कई तकलीफ़ें झेली हैं. मैं उसे पर्यटकों के लिए नहीं बल्कि अपनी परंपरा के लिए पहनती थी."

ज़ेंबर थाईलैंड में नहीं रहना चाहतीं और कहती हैं, "अब मुझे एक क़ैदी जैसा महसूस हो रहा है."