ममता गुप्ता और महबूब ख़ान
बीबीसी संवाददाता, लंदन
झुंझुनू राजस्थान से जसवन्त सिंह पूछते हैं कि अंतरिक्ष में लोग उल्टा क्यों सोते हैं.
अंतरिक्ष में क्योंकि कोई गुरुत्वाकर्षण नहीं होता इसलिए अंतरिक्ष यात्री ग़ुब्बारे की तरह उल्टे पुल्टे होते रहते हैं. इन्हे सोने के लिए एक बैग दिया जाता है जिसे बर्थ से बाँध दिया जाता है जिससे ये लोग आराम से सो सकें. जब अंतरिक्ष यान पृथ्वी के चारों ओर चक्कर काटता है तो गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध एक बल लगता है जिसे ज़ीरो ग्रैविटी या शून्य गुरुत्वाकर्षण कहते हैं. अंतरिक्ष यात्रियों को इसी स्थिति में खाने पीने सोने और काम करने का महीनों अभ्यास कराया जाता है.
पंकज ने पूछा है कि म्यूटेशन क्या है और कितने तरह का होता है.
पहले यह समझ लें कि जीन क्या होता है. जीन आनुवांशिकता की मूलभूत शारीरिक इकाई है. यानि इसी में हमारी आनुवांशिक विशेषताओं की जानकारी होती है जैसे हमारे बालों का रंग कैसा होगा, आंखों का रंग क्या होगा या हमें कौन सी बीमारियां हो सकती हैं. और यह जानकारी, कोशिकाओं के केन्द्र में मौजूद जिस तत्व में रहती है उसे डीऐनए कहते हैं. जब किसी जीन के डीऐनए में कोई स्थाई परिवर्तन होता है तो उसे म्यूटेशन कहा जाता है. यह कोशिकाओं के विभाजन के समय किसी दोष के कारण पैदा हो सकता है या फिर पराबैंगनी विकिरण की वजह से या रासायनिक तत्व या वायरस से भी हो सकता है.
क्लबपारा महसामुंड छत्तीसगढ़ से शैलेश यह जानना चाहते हैं कि सौर मंडल में मौजूद ग्रह, सूर्य की परिक्रमा करते हुए आपस में क्यों नहीं टकराते.
गुरुत्वाकर्षण के कारण सभी ग्रह अपनी-अपनी कक्षा में रहकर सूर्य का चक्कर लगाते हैं. हर ग्रह की वक्रता की एक गति है जो उसकी शुरुआत में निर्धारित हो गई थी और वही बनी हुई है. सब ग्रहों की वक्रता की गति अलग-अलग है लेकिन सब एक ही तल पर हैं इसलिए एक दूसरे से टकराने का सवाल नहीं उठता. वक्रता की गति से जो बल मिलता है वह सूर्य से दूर जाने का है जबकि गुरुत्वाकर्षण ग्रहों को सूर्य की ओर खींचता है. इन दोनों के बीच संतुलन की वजह से ही ग्रह सूर्य के भीतर न गिरके चारों ओर घूमते रहते हैं.
रहमानगंड बिहार से नारायण कुमार सिंह ने सवाल किया है कि नायाग्रा फ़ॉल्स किसे कहते हैं. यह कब की घटना है.
नायाग्रा फ़ॉल्स नायाग्रा नदी पर बने झरने हैं जिनका एक हिस्सा कैनेडा में पड़ता है और दो हिस्से अमरीका में. ये झरने गोट द्वीप के कारण दो भागों में बंट गए हैं. कैनेडा वाले झरनों को हॉर्सशू फ़ॉल्स कहा जाता है जबकि और अमरीका वाले झरनों को अमैरिकन फ़ॉल्स और ब्राइडल वेल फ़ॉल्स कहते हैं. कैनेडा वाले झरनों का किनारा 2200 फ़ीट चौड़ा है जबकि अमरीका वाले भाग का 850 और 50 फ़ीट है और ऊँचाई है 188 फ़ीट. ये झरने इतने विस्मयकारी और ख़ूबसूरत हैं कि हर वर्ष कोई एक करोड़ बीस लाख पर्यटक इन्हे देखने आते हैं. यह कोई बारह हज़ार साल पहले बने थे.
ब्लू कॉलर, व्हाइट कॉलर और इस तरह की कितने रंगों की नौकरियां होती हैं. यह सवाल किया है चंडीगढ़ से वर्षा सोगानी ने.
वर्षा जी कॉलर तो आप समझती ही हैं, कमीज़ का कॉलर. व्हाइट कॉलर यानि सफ़ेद कॉलर वाली नौकरी वह हुई जिसमें व्यक्ति किसी दफ़्तर में बैठ कर काम करता है. पश्चिमी देशों में दफ़्तर में काम करने वाले आमतौर पर सफ़ेद कमीज़ और गहरे रंग की पतलून पहना करते थे. अब भी पहनते हैं लेकिन अब इतनी औपचारिकता नहीं बरती जाती. ब्लू कॉलर या नीले कॉलर का संबंध शारीरिक श्रम वाले काम से है. औद्योगिक संस्थानों में यानि फ़ैक्टरियों में हल्के या गहरे नीले रंग के कपड़े पहने जाते हैं जिससे वो जल्दी गंदे न हों. पिंक कॉलर या गुलाबी कॉलर की नौकरियां भी होती हैं जिन्हे आमतौर पर महिलाएं करती हैं. जैसे नर्स, चिकित्सा कर्मी, सैक्रेटरी, रिसैप्शनिस्ट, वेट्रैस, बच्चों की देखभाल करने वाली, आम तौर पर महिलाएं होती हैं. गुलाबी रंग महिलाओं के साथ जोड़ा जाता है इसलिए ऐसी नौकरियों को पिंक कॉलर नौकरी कहते हैं. इसके अलावा गोल्ड कॉलर नौकरियां भी होती हैं. जैसे किसी डिपार्टमैन्टल स्टोर में, किसी रेस्तरां या बार में, होटल में. आमतौर पर 18 से 25 साल के युवा ये नौकरियां करते हैं. क्योंकि इस उम्र में उनपर कोई ज़िम्मेदारियां नहीं होतीं इसलिए ये लोग पैसा ख़ूब ख़र्च ख़ूब करते हैं. शायद इसीलिए इन्हे गोल्ड कॉलर कहा जाता है.
लकरी सीवान बिहार के सुद्दू यह जानना चाहते हैं कि सन 1962 में भारत चीन युद्ध के दौरान भारतीय सेना के प्रमुख कौन थे.
भारत चीन युद्ध के समय भारतीय सेना के प्रमुख थे जनरल आर ऐन थापर. वो 8 मई 1961 से 19 नवम्बर 1962 तक इस पद पर रहे. युद्ध 10 अक्तूबर 1962 को शुरु हुआ था और 20 नवम्बर 1962 को चीन ने एक तरफ़ा युद्धविराम घोषित कर दिया था.
अगर एड्स रोग से पीड़ित व्यक्ति का हाथ कट गया हो और ख़ून की बूंद निकल रही हो तो क्या उससे हाथ मिलाने से एड्स हो जाएगा. यह सवाल पूछा है मधुबनी बिहार से इम्तियाज़ अहमद.
जी नहीं. ऐचआईवी वायरस के संक्रमण के तीन प्रमुख ज़रिए हैं. एक है इस वायरस से पीड़ित व्यक्ति के साथ यौन संबंध, दूसरा ऐचआईवी पीड़ित व्यक्ति का ख़ून चढ़ाना या उस व्यक्ति द्वारा प्रयुक्त इंजैक्शन की सुंई इस्तेमाल करना और तीसरा मां से गर्भस्थ शिशु को इस वायरस का संक्रमण. दूध पिलाने से भी यह वायरस बच्चे तक पहुंच सकता है.