गुरुवार, 15 नवंबर, 2007 को 23:47 GMT तक के समाचार
संयुक्त राष्ट्र महासभा की एक समिति ने मौत की सज़ा रोकने का एक प्रस्ताव पारित किया है.
हालांकि यह प्रस्ताव किसी के लिए बाध्यकारी नहीं है लेकिन मानवाधिकार संस्थाओं का कहना है कि यह दुनियाभर की सोच को प्रदर्शित करता है.
दुनिया भर के 130 देशों ने पहले ही मौत की सज़ा पर रोक लगा रखी है.
लेकिन संभावना है कि अब यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में रखा जाएगा.
दो दिनों की ज़ोरदार और कई बार गर्मागर्म बहस के बाद 99 देशों ने मौत की सज़ा को रोके जाने के पक्ष में वोट किया.
इटली ने इस प्रस्ताव के पक्ष में माहौल बनाया था.
इस प्रस्ताव का विरोध करने वालों ने एक के बाद एक कई संशोधन रखे लेकिन उन सभी को ख़ारिज कर दिया गया.
संयुक्त राष्ट्र में ब्रिटेन के राजदूत सर जॉन सेवर्स ने कहा है कि इस प्रस्ताव का पारित होना अंतरराष्ट्रीय सोच को प्रदर्शित करता है.
उनका कहना था, "हमने आठ साल पहले इसकी कोशिश की थी. लेकिन इसके पक्ष में सिर्फ़ यूरोपीय संघ ने साथ दिया था. लेकिन अब हमारे पास अंतरराष्ट्रीय गठबंधन है. मैं समझता हूँ कि मृत्यु की सज़ा लागातार अलोकप्रिय होती जा रही है और इस पर कम भरोसा करते हैं."
अमरीका सहित 52 देशों ने इस प्रस्ताव के ख़िलाफ़ मत डाले.
इस विरोध का नेतृत्व सिंगापुर ने किया. उनका तर्क था कि मौत की सज़ा यह आपराधिक क़ानून का मामला है और इस पर अमल का फ़ैसला देशों पर ही छोड़ना चाहिए.
संयुक्त राष्ट्र में सिंगापुर के राजदूत वेणु गोपाल मेनन ने आरोप लगाया कि यूरोपीय देश अपने जीवन मूल्यों को सभी पर लादना चाहते हैं.
उन्होंने कहा, "वे दावा करते हैं कि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करते हैं लेकिन वे दूसरों को इसका अधिकार देने के ख़िलाफ़ मतदान करते हैं."
"वे लोग दावा करते हैं कि वे अपनी राय किसी पर नहीं थोपना चाहते लेकिन अब वे प्रस्ताव के ज़रिए दबाव बनाना चाहते हैं जिससे कई देश सहमत ही नहीं हैं."
वेणुगोपाल मेनन तर्क देते हैं, "अगर यह व्यवहार पाखंड, दोगलापन और असहिष्णुतापूर्ण नहीं है तो और क्या है."
इसके बाद अब यह प्रत्साव संयुक्त राष्ट्र महासभा में जाएगा और वहाँ इसे एक बार फिर वोट के लिए रखा जाएगा.
हालांकि यह किसी के लिए बाध्यकारी नहीं है लेकिन इसके पैरवीकार कहते हैं कि इसका प्रभाव तब भी दिखाई पड़ने लगेगा.