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मंगलवार, 23 अक्तूबर, 2007 को 15:53 GMT तक के समाचार

पल्लवी जैन
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

बर्माः लोकतंत्र की राह आसान नहीं है

संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत इब्राहीम गम्बारी ऐसे वक़्त पर भारत का दौरा कर रहे हैं जब बर्मा में लोकतंत्र की बहाली और मानव अधिकारों का हनन रोकने के लिए अंतराष्ट्रीय समुदाय बर्मा पर दबाव बनाना चाहता है.

भारत और चीन बर्मा के साथ व्यापारिक संबंध रखने वाले दो प्रमुख पड़ोसी देश हैं और कहा जाता है कि दोनों के ही वहाँ के सैन्य शासन से अच्छे संबंध हैं.

तो स्वाभाविक है कि बर्मा में किसी भी प्रकार का परिवर्तन लाने में दोनों देश महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.

लेकिन शायद ये इतना आसान नहीं क्यूँकि दोनों ही देशों के बर्मा से आर्थिक और सामाजिक हित जुड़े हुए हैं जहाँ प्राकृतिक गैस का बहुत बड़ा भंडार है.

तो इन परिस्थितियों के मद्दे नज़र इब्राहीम गम्बारी ने भारत सरकार के सहयोग से संतुष्टि जताई और चीन सरकार की मदद की भी सराहना की लेकिन साथ ही साथ कहा की "सिद्धांत रूप से हम सभी और प्रयास कर सकते हैं".

बर्मा में कई दशकों से सैनिक शासन है और पहले भी लोकतंत्र की पहल करने वालों के साथ वहाँ की सरकार ने कड़ा रवैया अपनाया है.

यहाँ तक कि नोबेल पुरस्कार विजेता ऑंग सान सूची कई वर्षों से नज़रबंद है.

कड़ी प्रतिक्रिया

लेकिन पिछले महीने रंगून में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों पर जब गोलियाँ चली तो अंतराष्ट्रीय समुदाय ने तीखी प्रतिक्रिया ज़ाहिर की.

अमरीका और यूरोपीय संघ ने बर्मा पर कई प्रतिबंध लगाए और सिंगापुर जैसे आसियान के सदस्य देशों ने बर्मा सरकार की कड़ी आलोचना की.

शायद इसी दबाव को बरक़रार रखने के लिए गम्बारी थाईलैंड, मलेशिया और इन्डोनेशिया जा चुके हैं और भारत के बाद चीन और जापान भी जाएँगे.

भारत दौरे पर गम्बारी विदेश सचिव, विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भी मिले.

विदेश मंत्रालय के अनुसार भारत का पक्ष है कि बर्मा में राजनैतिक परिवर्तन की प्रक्रिया में तेजी लाई जाए और इस प्रक्रिया में सारे गुटों, सभी वर्ग और सारे पक्षों का सहयोग हो.

बहुआयामी संबंध

लेकिन एक पड़ोसी मित्र देश के नाते भारत के बर्मा के साथ बहुआयामी संबंध हैं और कोई भी क़दम ये सोच कर उठाना चाहिए कि बर्मा में शांति और स्थिरता रहे.

इन बयानों के चलते संयुक्त राष्ट्र के दूत गम्बारी ने ये आशा जताई है कि भारत और अन्य देशों की इन बातों का ज़मीनी स्तर पर ठोस असर पड़ेगा.

गम्बारी ने कहा "भारत और अन्य देशों को चाहिए की वह बर्मा को अधिक व्यापक बातचीत में शामिल करें ताकि मेरे हर बर्मा दौरे पर मुझे ठोस सकारात्मक बदलाव मिले".

तो बर्मा के मुद्दे पर अंतराष्ट्रीय स्तर पर बातों का दौर तो चलता रहेगा लेकिन परिस्थितियों के मद्देनज़र बर्मा में लोकतंत्र के समर्थकों के लिए रास्ता कठिन नज़र आ रहा है.