बुधवार, 10 अक्तूबर, 2007 को 10:25 GMT तक के समाचार
अमरीका में एक संघीय जज ने ग्वांतनामो बे शिविर में रखे गए एक बंदी मोहम्मद अब्दुल रहमान को ट्यूनीशिया भेजने पर पाबंदी लगा दी है क्योंकि वहाँ उस बंदी को प्रताड़ित किए जाने की आशंका है.
जज ने कहा है कि मोहम्मद अब्दुल रहमान को ट्यूनीशिया भेजना ऐसे हालात में 'न्याय की घोर अनदेखी' होगी जब सुप्रीम कोर्ट बंदियों के अधिकारों पर जल्दी ही फ़ैसला सुनाने वाला है.
अमरीकी सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर जल्दी ही कोई फ़ैसला सुनाने वाला है कि ग्वांतनामो बे शिविर में रखे गए बंदियों को क्या अपने मामले दीवानी अदालतों में ले जाने का अधिकार है?
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि जज का यह फ़ैसला असाधारण है और ऐसा पहला मामला भी है जब ऐसे किसी मुक़दमे में किसी जज ने सीधे हस्तक्षेप किया है.
उधर ट्यूनीशिया ने मोहम्मद अब्दुल रहमान के इन आरोपों का खंडन भी किया है कि वहाँ बंदियों को प्रताड़ित किया जाता है.
अलबत्ता अमरीकी विदेश मंत्रालय की वर्ष 2007 के आरंभ में तैयार की गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्यूनीशिया सरकार ने मानवाधिकार का गंभीर उल्लंघन जारी रखा हुआ है.
रिपोर्ट में मानवाधिकार संगठनों के हवाले से कहा है कि ट्यूनीशिया के सुरक्षा बलों ने कुछ मामलों में लोगों को को नींद से वंचित रखना, बिजली के झटके देना, पानी में सिर डुबो देना, पिटाई और सिगरेट से जलाने जैसे तरीके अपनाए हैं.
वाशिंगटन डीसी की ज़िला जज ग्लैडीज़ कैसलर ने अपने फ़ैसले में कहा है कि मोहम्मद अब्दुल रहमान को ट्यूनीशिया नहीं भेजा जा सकता क्योंकि वहाँ उन्हें असीमित नुक़सान पहुँचाए जाने की आशंका है.
जज ग्लैडीज़ कैसलर ने कहा, "जैसाकि मोहम्मद अब्दुल रहमान ने आरोप लगाया है कि अगर उन्हें ट्यूनीशिया भेजा गया तो उन्हें प्रताड़ित किया जाएगा, ऐसे हालात में अगर उन्हें वहाँ भेजा जाता है तो यह न्याय की घोर अनदेखी होगी."
मोहम्मद अब्दुल रहमान को दिल की कुछ बीमारी है और उनकी दलील है कि अगर उन्हें ट्यूनीशिया भेजा जाता है तो उन्हें 20 साल के लिए जेल में डाला जा सकता है और वह उनकी मौत की सज़ा में भी तब्दील हो सकता है.
मोहम्मद अब्दुल रहमान के वकील ने जज के फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि यह पहला मौक़ा है जब किसी अदालत ने ग्वांतनामो बे शिविर में रखे गए बंदियों के साथ बर्ताव के मामले में हस्तक्षेप किया है.
अमरीका के न्याय मंत्रालय के एक प्रवक्ता एरिक ऐबलिन ने कहा है कि सरकार की दलील थी कि किसी ज़िला अदालत को इस मामले में फ़ैसला देने का अधिकार नहीं है. सरकार अब इस फ़ैसले के बाद अपने विकल्पों पर विचार कर रही है.