बुधवार, 03 अक्तूबर, 2007 को 03:50 GMT तक के समाचार
तुर्की में महिला संगठन संविधान संशोधन के प्रस्ताव का विरोध कर रहे है. उनका कहना है कि इससे लिंगभेद के मामले में देश समय से पीछे चला जाएगा.
वहाँ सरकार महिलाओं से जुड़े उस क़ानून को बदलने की तैयारी कर रही है जो 1980 में हुए सैन्य तख़्तापलट के बाद लागू किया गया था.
नए क़ानून के प्रारूप में महिलाओं को एक ऐसे कमज़ोर समूह के रुप में दर्शाया गया है जिन्हें सुरक्षा प्रदान करने की ज़रुरत है.
इस प्रस्तावित संविधान संशोधन को लेकर पहले से ही नाराज़गी शुरु हो गई है क्योंकि इसमें एक प्रावधान यह भी है कि महिलाएँ यूनिवर्सिटी में सिर ढँकने वाला इस्लामी स्कार्फ़ पहन कर जा सकेंगी.
लेकिन प्रधानमंत्री तैयप आर्दोगान ने नए क़ानून का विरोध कर रहे लोगों को आश्वस्त किया है कि इससे सभी समुदाय की ज़रुरतों और उनके मूल्यों की रक्षा होगी.
'पितृसत्तात्मक समाज'
80 से भी अधिक महिला संगठनों ने एकसाथ आकर इस नए संविधान संशोधन के प्रारुप का विरोध किया है.
उनका कहना है कि यह महिलाओं को बराबरी का अधिकार देने के मामले में समय से पीछे ले जाने वाला क़ानून होगा.
तुर्की का मौजूदा संविधान सरकार को बाध्य करता है कि वह सभी के लिए समान अवसर उपलब्ध करवाए, जिसमें महिलाएँ भी शामिल हैं.
महिलाएँ नए संविधान प्रारूप में में भी इसे शामिल करवाना चाहती हैं.
जबकि नए प्रारुप में महिलाओं को एक कमज़ोर समूह के रुप में रखकर उन्हें संरक्षण दिए जाने का प्रावधान किया गया है.
महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली कार्यकर्ता सेलेन लेमियोग्लू का कहना है कि इस प्रस्ताव से पता चलता है कि तुर्की अभी भी पितृसत्तात्मक समाज है.
उनका कहना है, "यदि सरकार इसे स्वीकार करती है तो यह महिलाओं और पुरुषों के प्रति उनकी मानसिकता और आदर्श को दर्शाती है. "
उनका कहना है कि महिलाओं को संरक्षण दिए जाने की ज़रुरत नहीं है.
विवाद
एक बड़ा विवाद सिर को ढँकने वाले उस इस्लामी स्कार्फ़ का है जिसका प्रयोग तुर्की की 60 प्रतिशत महिलाएँ करती हैं.
लेकिन सरकारी कार्यालयों, स्कूलों और यूनिवर्सिटी में इनका प्रयोग प्रतिबंधित है.
सरकार का कहना है कि नया क़ानून महिलाओं को इस्लामी स्कार्फ़ के साथ यूनिवर्सिटी जाने की इजाज़त देगा.
लेकिन महिला संगठन अभी तक इस बारे में एकमत नहीं हो सकी हैं.
ठीक उसी तरह जिस तरह तुर्की का समाज इस मामले में विभाजित है.
फ़िलहाल संविधान का प्रारुप तैयार हुआ है लेकिन महिला संगठनों की माँग है कि इस बारे में उनकी राय ज़रुर ली जानी चाहिए.