मंगलवार, 21 अगस्त, 2007 को 14:04 GMT तक के समाचार
जॉनाथन मारकस
कूटनीतिक मामलों के संवाददाता
जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे तीन दिन के दौरे पर भारत आए हुए हैं और उनके साथ 100 से भी अधिक लोगों का प्रतिनिधिमंडल है.
बातचीत का मुख्य बिंदु तो आपसी व्यापार होगा लेकिन इस दौरान रणनीतिक महत्व के विषय भी सामने आएँगे.
एशिया में शक्ति संतुलन को ध्यान में रखकर ऐसी कोशिशें चल रही हैं कि भारत, जापान, अमरीका और ऑस्ट्रेलिया को क़रीब लाया जाए.
वैसे तो जापान के प्रधानमंत्री भारत में उन्हीं सब मुद्दों पर बात करेंगे जो हर प्रधानमंत्री किसी दूसरे देश में जाकर करता है – आपसी रिश्तों, व्यापार और आर्थिक मामलों पर लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही है.
जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे की यात्रा जुड़ी है चीन और अमरीका के बीच बढ़ रही प्रतिद्वंद्विता से.
जापान, अमरीका और ऑस्ट्रेलिया कूटनीति के इस खेल में अगर भारत को साथ लेकर चीन को घेरना नहीं चाहते तो कम से कम एक संतुलन बनाने की ‘कोशिश’ तो कर ही रहे हैं.
कोशिश इसीलिए क्योंकि इन चार देशों ने अभी तक कोई गठबंधन नहीं बनाया है और न ही इनकी आपसी समझदारी किसी अहम चरण में पहुँची है.
चीन के ख़िलाफ़ रणनीति?
दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अमरीका पर सुरक्षा के लिए आश्रित जापान हाल में अपनी ताक़त बढ़ाने की कोशिश करता रहा है और ऐसा वो अमरीका के साथ तालमेल बढ़ाकर कर रहा है.
एक कारण है उत्तर कोरिया का परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम लेकिन जापान अपनी ताक़त बढ़ाने के साथ-साथ विश्व में नए सैनिक तालमेल भी बिठाना चाहता है.
मनीला में वर्ष 2006 में आसियान की बैठक में आमंत्रित अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के प्रतिनिधियों ने अलग से भारत से मुलाक़ात की थी.
चारों ने मिलकर जो बातचीत की उसे कुछ विशेषज्ञों ने एक नए रक्षा संबंध की ओर बढ़ने के लिए एक अहम क़दम बताया था.
लेकिन मेसैच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलोजी के प्रोफ़ेसर रिचर्ड जे सैम्युअल्स कहते हैं कि ये चार देश अब भी सही तालमेल ढूँढ ही रहे हैं.
जापान की सुरक्षा पर “सिक्योरिंग जापान” नाम की किताब लिखने वाले प्रोफ़ेसर रिचर्ड जे सैम्युअल्स का कहना है कि इस मामले में अमरीका और जापान आगे बढ़ने के बहुत इच्छुक हैं.
एशिया में समीकरण
अमरीका ने जहाँ नैटो यानी उत्तरी अटलांटिक गठबंधन संधि के ज़रिए यूरोप और अमरीकी महाद्वीप में अपनी पकड़ बना रखी है वहीं एशिया में ऐसा कोई मज़बूत गठबंधन नहीं है.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अब तक प्रशांत महासागर में अमरीका को भारत और चीन की बढ़ती ताक़त से चुनौती मिली है.
सुरक्षा के अलावा आतंकवाद, समुद्री लुटेरों और व्यापार मार्गों की सुरक्षा ऐसे मामले हैं जिनके कारण एशिया में सुरक्षा का तानाबाना विकसित करने की ज़रूरत है.
26 सदस्यीय एआरएफ़ यानी आसियान रीजनल फ़ोरम ने भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अमरीका को एक साथ लाने की कोशिश की है.
संकटकाल में सहयोग बढ़ाने के लिए एक नई समिति बनाने की भी कोशिश आसियान रीजनल फ़ोरम कर रहा है लेकिन फिर भी आसियान कुल मिलाकर कूटनीति और आर्थिक मामलों से जुड़ा संगठन है सुरक्षा मामलों से जुड़ा नहीं.
अगर अमरीका और जापान भारत को अपने साथ ले पाते हैं तो ये सवाल भी उठेगा कि ये गठबंधन क्या चीन के ख़िलाफ़ नहीं है.
ऐसा पूछते ही सबसे तेज़ आवाज़ भारत की ओर से आती है – नहीं हम चीन के ख़िलाफ़ लामबंद नहीं हो रहे हैं. बाक़ी तीन देश भी यही कहते नज़र आते हैं.
लेकिन जानकार कहते हैं कि चीन की बढ़ती ताक़त के ख़िलाफ़ एशिया में एक दूसरा बहुआयामी ध्रुव बनाने की कोशिशें जारी हैं.
इसका एक और उदाहरण है- भले ही भारत का इन देशों के साथ कोई रक्षा समझौता न हो लेकिन सितंबर में भारत अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ बंगाल की खाड़ी में नौसैनिक अभ्यास करने जा रहा है.